भारत का संविधान क्या है? (What is Indian Constitution in Hindi) – जाने हिंदी में।

भारत का संविधान क्या है? (What is Indian Constitution in Hindi)

दोस्तों, आज हम बात करेंगे की भारत का संविधान क्या है(What is Indian Constitution in Hindi)। भारतीय संविधान में वर्तमान समय में 395 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं और यह 22 भागों में विभाजित है। परन्तु इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद जो 22 भागों में विभाजित थे। इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं। भारत का संविधान, भारत का सर्वोच्च विधान है जो संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। आज हम जानेंगे की “भारत का संविधान क्या है? (What is Indian Constitution in Hindi)“, “भारतीय संविधान का इतिहास (History of Indian Constitution in Hindi)“, “भारतीय संविधान का निर्माण (Construction of Indian Constitution in Hindi)“, “भारतीय संविधान की विशेषताएं (Features of Indian Constitution  in Hindi)“, “भारतीय संविधान दिवस कब मनाया जाता हैं? (When Indian Constitution Day is Celebrated)“। इस पोस्ट में, मै “भारत का संविधान क्या है?” से सम्बन्धित हर एक सवालों का जवाब देने जा रही हूँ मुझे आशा है कि आपको निश्चित रूप से आपका जवाब मिल जायेगा।

भारत का संविधान क्या है? (What is Indian Constitution in Hindi)

किसी भी देश का संविधान अपने राजनीतिक तंत्र के बुनियादी ढांचे को निर्धारित करता है। जिसके अंतर्गत उसके लोग शासित होते हैं। यह राज्य विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे प्रमुख कानून स्थापित करता है, उनकी शक्तियों को बताता है। उनकी दायित्वों का निर्धारण करता है और अपने जनता के साथ संबंधों को नियंत्रित करता है। लोकतंत्र में संप्रभुता जनता में निहित है। आदर्श रूप में, लोग खुद पर शासन करते हैं। संविधान में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की व्‍यवस्‍था की गई है। जिसका ढांचा कुछ अपवादों के अलावा संघीय है। केंद्रीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केंद्रीय संसद की परिषद में एक राष्ट्रपति और दो सदन (कक्ष) हैं। जिन्हें राज्यसभा राज्य परिषद और लोकसभा के रूप में जाना जाता है।

यह संविधान की धारा 74 (1) में किया गया है कि राष्ट्रपति की सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रियों की एक परिषद होगी, जिसका मुखिया प्रधान मंत्री होगा, राष्ट्रपति इस परिषद की सलाह के अनुसार अपना कार्य करेंगे। इस प्रकार, वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित है। जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है, जो वर्तमान में नरेंद्र मोदी है। मंत्रिपरिषद लोगों के सदन (लोकसभा) के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार है। प्रत्येक राज्य में एक असेंबली (विधानसभा) है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एक ऊपरी सदन है। जिसे विधान परिषद कहा जाता है। राज्यपाल राज्य का मुखिया है। प्रत्येक राज्य में एक गवर्नर होगा और राज्य की कार्यकारी शक्ति इसमें निहित होगी। मंत्रिपरिषद, जिसका प्रमुख मुख्‍यमंत्री है, राज्यपाल को उनके कार्यकारी कार्यों के निष्पादन में सलाह देते हैं। मंत्रिपरिषद राज्य विधान सभा के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार है।

भारतीय संविधान का इतिहास (History of Indian Constitution in Hindi)

  • 1946 में संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के तहत किया गया था। डॉ राजेंद्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष और डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
  • प्रारूप रिपोर्ट तैयार करने के लिए 13 समितियों की स्थापना की गई थी। जिनका गठन संविधान पूरा होने के बाद किया गया था।
  • संविधान सभा में 389 सदस्य थे। जिसमें प्रारंभिक विश्लेषित विवरण में – प्रांत के 292 प्रतिनिधि, देशी रियासतों के 93 प्रतिनिधि, मुख्य आयुक्त क्षेत्रों के 3 प्रतिनिधि तथा बलूचिस्तान का 1 प्रतिनिधि शामिल था। बाद में मुस्लिम लीग की संख्या कम होने के कारण 299 प्रतिनिधि रह गए थे।
  • जनवरी 1948 में भारतीय संविधान का पहला प्रारूप विचार-विमर्श के लिए प्रस्तुत किया गया।
  • 4 नवंबर 1948 में 32 दिनों तक विचार-विमर्श जारी रहा था। इस अवधि के दौरान, 7635 संशोधन प्रस्तावित किए गए थे और उनमें से 2473 पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई थी। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में कुल 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे थे।
  • 24 जनवरी 1950 में संविधान सभा के 284 सदस्यों द्वारा भारत के संविधान पर हस्ताक्षर किए गए थे। जिनमें 15 महिलाएं भी शामिल थीं।
  • 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। इस दिन संविधान दिवश मनाया जाता हैं जो हम गणतंत्र दिवश के रूप में मानते हैं।

भारतीय संविधान के विकास को 6 चरणों में विभाजित किया गया है –

    1. प्रथम चरण (1773-1857 ई. तक)
    1. द्वितीय चरण (1858-1909 ई. तक)
    1. तृतीय चरण (1910-1939 ई. तक)
    1. चतुर्थ चरण (1940-1947 ई. तक)
    1. पंचम् चरण (1947-1950 ई. तक)
  1. षष्ठम् चरण (1950 ई. से आज तक)

भारतीय संविधान का निर्माण (Construction of Indian Constitution in Hindi)

भारतीय संविधान को बनाने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। डॉ. भीम राव अम्बेडकर को भारतीय संविधान का जन्मदाता कहा जाता है। इसके अलावा संविधान निर्माण के कार्य को पूरा करने में अन्य 284 सदस्यों ने भी अपना योगदान दिया था।

भारतीय संविधान के प्रमुख अधिनियम 

1. रेगुलेटिंग एक्ट (1773) Regulating Act –इस एक्ट के अंतर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई। जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे। जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं –

  • कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया।
  • बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया।
  • कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई।

2. 1784 ई. का पिट्स इंडिया एक्ट- इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ। जो इस प्रकार हैं।

  • कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स – व्यापारिक मामलों के लिए।
  • बोर्ड ऑफ़ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए।

3. 1793 ई. का चार्टर एक्ट Charter Act of 1793 – इस एक्ट के तहत व्यापारिक अधिकार को भारत में 20 साल और बढ़ा दिया गया। अपने कौंसिलों के निर्णय को रद्द करने का अधिकार (जो 1786 के अधिनियम में सिर्फ गवर्नर जनरल कार्नवालिस के पास था) गवर्नल जनरल के साथ-साथ अन्य गवर्नरों को भी दिया गया।

(i) चार्टर एक्ट (1813) Charter Act of 1813 – 

  • इस एक्ट के द्वारा कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।
  • चीन के साथ चाय के व्यापार का एकाधिकार अब भी कम्पनी के पास था।
  • ईसाई धर्म प्रचारकों को भारतीय क्षेत्र में बसने की अनुमति दी गयी। कम्पनी का भारतीय प्रदेशों और राजस्व पर 20 वर्षों तक का नियन्त्रण स्वीकार किया गया।

(ii) चार्टर एक्ट (1833) Charter Act of 1833 – फिर से 20 वर्ष के लिए कम्पनी का भारतीय प्रदेशों और राजस्व पर नियंत्रण स्वीकार किया गया। कम्पनी के चीन के साथ चाय व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि बंगाल के गवर्नर जनरल को पूरे भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। अभी तक गवर्नल जनरल के कार्यकारिणी में तीन सदस्य होते थे। अब चौथा सदस्य भी था। वह लॉर्ड मकौले था। उसे विधि सदस्य बनाया गया। दास प्रथा को ख़त्म करने का प्रावधान इसी चार्टर एक्ट में किया गया।

(iii) चार्टर एक्ट (1853) Charter Act of 1853 –  फिर 20 साल बाद चार्टर एक्ट आया। इसी एक्ट के द्वारा शासकीय सेवा के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का प्रावधान किया गया।

4. 1861 ई. का भारत शासन अधिनियम – (i) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया। (ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ। (iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई। (iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई।

5. 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम – (i)अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई, (ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई।

6. 1909 ई० का भारत शासन अधिनियम [मार्ले -मिंटो सुधार] – 

  • पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया।
  • भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई।
  •  केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला।
  • प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई।

7. 1919 ई० का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार] – 

इस अधिनियम को मौन्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार (Montagu–Chelmsford Reforms) के नाम से भी जाना जाता है। इसी अधिनियम के माध्यम से केंद्र में द्विसदनात्मक व्यवस्था का निर्माण हुआ। जो आज लोक सभा और राज्य सभा के रूप में है। उस समय लोक सभा को केन्द्रीय विधान सभा और राज्य सभा को राज्य परिषद् करके संबोधित किया जाता था। केन्द्रीय विधान सभा में 140 सदस्य थे। जिसमें 57 निर्वाचित सदस्य थे। राज्य परिषद् में 60 सदस्य थे। जिसमें 33 निर्वाचित थे। प्रांतीय बजट को केन्द्रीय बजट से अलग इसी अधिनियम के माध्यम से किया गया।

8.  1935 ई० का भारत सरकार अधिनियम Govt. of India Act 1935 – तीन गोलमेज सम्मेलनों के बाद आए। इस अधिनियम में 321 अनुच्छेद (321 articles) थे। यह अधिनियम सबसे अधिक विस्तृत था। इसके द्वारा भारत परिषद् को समाप्त कर दिया गया। प्रांतीय विधानमंडलों की संख्या में वृद्धि की गयी। बर्मा के प्रशासन भारत के प्रशासन से अलग किया गया।

9. संविधान सभा (1946) Constitutional Assembly – संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन किया गया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों के सदनों के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने जाने वाले थे और यह चुनाव 9 जुलाई, 1946 को हुआ। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई। जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव अम्बेडकर, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। बाद में यही संविधान सभा दो हिस्सों में बंट गया। जब पाकिस्तान अलग राष्ट्र बन गया। भारतीय संविधान सभा और पाकिस्तान की संविधान सभा

भारतीय संविधान की विशेषताएं (Features of Indian Constitution  in Hindi)

संविधान के 42 वें संशोधन द्वारा 1976 में भाग 4 को जोड़कर अनुच्छेद 51 के अंतर्गत दस मूल कर्तव्य भी जोड़े गये। 86 वें संविधान संशोधन द्वारा एक और मूल कर्तव्य जोड़ा गया। वर्तमान में 11 मूल कर्तव्य हैं। संविधान की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. लोकसत्ता मुल्क – संविधान शासन व्यवस्था के संगठन, संचालन और नियमन के नियमों का व्यवस्थित संग्रह हैं। हमरे संविधान  शक्ति का अधिष्ठान या आधार लोक-सत्ता हैं। उसमें कहा गया है, ‘हम भारत के निवासी’, अपनी इस संविधान के साथ में इस संविधान को अंगीकृत (Adopted) अधियामित तथा आत्मार्पित करते हैं।
  2. लोकतंत्रात्मक स्वरूप – नए संविधान ने भारत में एक सबल और सुनिश्चित लोकशाही की नीव डाली हैं। इसने भारत की जनता को, भारतीय राज्य की सर्वोपरी सत्ता प्रदान की हैं। यानि शासन की अंतिम  जनता के हाथों में राखी गयी हैं। शासन के विविध अंगों का निर्माण जनता करती हैं।
  3. गणतंत्रात्मक चरित्र – जनतंत्र  चरम-सीमा उसका गणतंत्रात्मक चरित्र हैं। हमारे संविधान ने  के नागरिको को ब्रिटेन से भी अधिक व्यापक रूप से पद पाने का     राजनितिक अधिकार दिया हैं। ब्रिटेन एक प्रजातांत्रिय देश हैं। जहाँ राजा और प्रजा हैं। लेकिन भारत में न कोई राजा हैं और न ही कोई प्रजा। भारत का राष्ट्रपति देश का नागरिक होता हैं। इस नाते हम कह सकते हैं की हमरे संविधान ने देश में एक गणतंत्रात्मक जनतंत्र की स्थापना की हैं।
  4. निर्मित परन्तु विकसित – किस प्रकार इस देश में प्रतिनिधि मुल्क-संस्थाओ उतरदायी शासन और संघवाद का विकास हुआ हैं। यह संविधान एक संविधान सभा द्वारा एक निश्चित अवधि के भीतर बनाया गया हैं।
  5. मूलतः लिखित – हमारा संविधान मूलतः लिखित हैं। निर्माताओं ने इसके भीतर शासन व्यवस्था के उस प्रतेक प्रश्न का उत्तर दिया हैं। हमारा संविधान आकार की दृष्टि से संसार में सबसे बडा संविधान है। इसके भीतर 395 अनुच्छेद हैं जो 22 खण्डों में विभक्त हैं। इसके अंत में 12 अनुसूचिय भी जोड़ी गई हैं।
  6. सुपरिवर्तनीय – भारत का संविधान सुपरिवर्तनीय (flexible) यानि लचीला हैं। किसी संविधान की नम्यता (Flexibility) यानि लचीलापन इस बात पर निर्भर करती हैं की उसकी संशोधन- प्रक्रिया कितनी सरल हैं।
  7. संघात्मक स्वरूप – भारत संविधान में कही भी भारत के लिए संघ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया हैं। उसे संयुक्त- देश के नाम से पुकार गया हैं तथा उसकी शासन व्यवस्था संघयी पद्धति पर आधारित हैं।
  8. संसदात्म्क शासन – नए संविधान के अंतर्गत हमारे देश में एक संसदात्म्क-शासन की स्न्थापना की गई हैं। संसदात्म्क-शासन के अर्थ – (i) कार्यपालिका (मंत्रीमंडल) पर विधायिका (संसद) का नियंत्रण यानि राष्ट्र के विधि-निर्माण संसद पर हैं। (ii) संसद को राष्ट्र की सर्वोच्च सत्ता प्राप्त होती हैं।
  9. मौलिक अधिकार – जनतंत्र का मूल आधार व्यक्ति हैं। उसके विकास के लिए अनुकूल सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक दशाओ की आवश्यकता होती हैं। हमारे संविधान ने इस मौलिक अधिकार को प्रदान किये हैं।
  10. लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना – हमारे संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह हैं कि उसमें लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना की दृष्ठि के निति-निर्देशक तत्वों का समावेश किया गया हैं। इसका प्रयोजन केवल यह हैं की देश में बनाने वाले भिन्न डालो के शासन के सामने लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना के ये तत्व आदर्श के रूप में रहें।
  11. धर्म-निरपेक्ष राज्य की कल्पना – हमारे संविधान ने देश में एक धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना की हैं। इसका अर्थ हैं की –
  • राज्य की ओर से किसी धर्म विशेष के पालन या प्रचार में किसी प्रकार की सहायता नहीं दी जाएगी और न नही बढ़ा डाली जाएगी।
  • किसी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष का अनुयायी होने न तो कोई सुविधा ही दी जाएगी और न उसे किसी अधिकार से वंचित ही किया जायेगा।
  • प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार रहेगा की वह अपने विश्वाश के आधार पर किसी भी धर्म का अनुसरण कर सके।
  • किसी भी व्यक्ति का समुदाय को यह अधिकार नहीं होगा की राज्य के भीतर किसी भी प्रचलित धर्म की निंदा वह कर सके अथवा बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन का प्रयास करे।

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