नागरिकता क्या है? (What is Citizenship in Hindi) – जानिए हिंदी में।

नागरिकता क्या है? (Nagrikta Kise Kahate Hain)

विषय-सूची

इस पोस्ट में जानेंगे की “नागरिकता क्या है? (What is Citizenship in Hindi)“। हर राज्य में रहने वाले लोगों की संख्या लाखों और करोड़ों में है, लेकिन सभी को नागरिक नहीं कहा जा सकता है।

‘नागरिकता क्या है?’ एक नागरिक वह होता है, जिसे वहां सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। नागरिकता क्या है? सामाजिक अधिकार सभी लोगों को प्राप्त होते हैं।

जैसे कानून के समक्ष समानता (Equality), यात्रा की स्वतंत्रता (Freedom of Travel), किसी धर्म का पालन करने या उसके विवेक के अनुसार धर्मांतरण का अधिकार (Right of Conversion) आदि होता है।

‘नागरिकता क्या है?’ लेकिन राजनीतिक अधिकार जैसे- वोट देना (To Vote), चुनाव लड़ना (Contest), कोई सरकारी पद ग्रहण करना (Hold a Government Office), कोई पार्टी बनाना (Make a Party), सरकार का विरोध या समर्थन करना आदि केवल नागरिकों को दिये जाते हैं। ज्यादातर लोग जन्म से ही नागरिक (Citizen) होते है।

नागरिकता क्या है? यानी जब लोग जन्म लेते है तो उन्हें उस राज्य की नागरिकता (Citizenship) मिल जाती है। लेकिन कुछ संख्या प्राकृतिक या अप्राकृतिक नागरिकों की भी है, जो आवेदन करके उस राज्य का नागरिक बन सकते हैं।

नागरिकता क्या है? (What is Citizenship in Hindi)
नागरिकता क्या है? (What is Citizenship in Hindi) नागरिकता एक नागरिक का राजनीतिक समुदाय का एक सहभागी सदस्य होता है। राष्ट्रीय, राज्य या स्थानीय सरकार की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करके नागरिकता प्राप्त की जाती है। एक राष्ट्र अपने नागरिकों को कुछ अधिकार और विशेषाधिकार देता है।

“नागरिक किसे कहते हैं?” ऐसे व्यक्ति को कुछ निर्धारित शर्ते पूरी करनी पड़ती हैं तथा उस राज्य के प्रति अपनी सत्यनिष्ठा (Truthfulness) की घोषणा करनी पड़ती है। सरकार की अनुमति पाने के बाद उसे वहाँ की नागरिकता मिल जाती है।

‘नागरिकता क्या है?’ नागरिकता लोकतंत्रात्मक (Democratic) राज्य व्यवस्था के मूल अपरिहार्य (Inevitable) सिद्धांत को कानूनी रूप प्रदान करती है। वह इसका प्रतीक है कि व्यक्ति को राज्य की पूर्ण राजनीतिक सदस्यता प्राप्त है।

राज्य के प्रति उसकी स्थायी निष्ठा (Loyalty) है और वह राज्य द्वारा इस बात के अधिकाधिक स्वीकृति है कि उसे राजनीतिक प्रणाली (Political System) में शामिल कर लिया गया है।

‘नागरिकता क्या है?’ नागरिकता आपको कुछ अधिकार (Rights), दायित्व (Responsibility), कर्तव्य (Obligation) और विशेषाधिकार (Privilege) प्रदान करती है। जो एक नागरिक को प्राप्त होता है।

ये सब विदेशियों को प्राप्त नहीं होते है। सभी लोक पदों के मार्ग नागरिक के लिए खुले होते हैं। मतदान करने का अधिकार तथा मूल अधिकार केवल नागरिकों को ही मिलते हैं और कर (Tax) अदा करने, राष्ट्र की रक्षा करने आदि जैसे दायित्व नागरिकों के होते हैं।

‘नागरिकता क्या है?’ नागरिकता को व्यक्ति तथा राज्य के बीच कानूनी संबंध (Legal Relationship) के रूप में भी देखा जा सकता है। जिसके अंतर्गत व्यक्ति अपनी विश्वस्तता (Fidelity) राज्य के प्रति व्यक्त करता है और राज्य व्यक्ति को अपना सुरक्षा (Protection) प्रदान करता है।

नागरिक का इंग्लिश मीनिंग (Citizen Meaning in English)

“नागरिकता क्या है?” नागरिकता एक विशेष सामाजिक (Social), राजनीतिक (Political), राष्ट्रीय (National) या मानव संसाधन समुदाय (Human Resources Community) का नागरिक होने की अवस्था है।

नागरिकता की स्थिति, एक सामाजिक अनुबंध (Contract) के सिद्धांत के अनुसार अधिकार और जिम्मेदारियां दोनों शामिल हैं।

“सक्रिय नागरिकता” के दर्शन यानी नागरिकों के जीवन में सुधार करने के लिए आर्थिक सहभागिता (Participation), सार्वजनिक (Public), स्वयंसेवी कार्य (Volunteer Work) और इसी प्रकार के प्रयासों के माध्यम से अपने समुदाय को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।

मुख्यत: रूप से नागरिकता नागरिक को ही दिया जाता है। अत: हिंदी में नागरिक को “नागरिक (Citizen), शहर वाले (Townsfolk), नगर-निवासी (City Dweller), निवासी (Resident)” कहा जाता है।

नागरिक का इंग्लिश मीनिंग यानि नागरिक को इंग्लिश में “सिटीजन (Citizen), सिटिज़नरी (Citizenry), तौन्स्में (Townsman), डेन्ज़ेन (Denizen) कहा जाता है।

नागरिक का अर्थ हिंदी में (Citizen Meaning in Hindi)

नागरिक शब्द का शाब्दिक अर्थ “शहर निवासी या नगर में रहने वाला निवासी” होता है। नागरिक (Citizen) वह व्यक्ति होता है, जो नगर, राज्य और देश में रहता है। लेकिन नागरिक इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक (Very Wide) और सार्वभौमिक (Universal) है।

20 जनवरी 1949 को, भारत के लोगों ने भारत को कुल संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए एक संविधान को अपनाया। भारत के लोगों को इस लोकतांत्रिक गणराज्य और संविधान से उम्मीद थी

कि यह भारत के सभी नागरिकों को न्याय (Justice), अभिव्यक्ति (Expression), स्वतंत्रता (Freedom) और समानता (Equality) लाएगा और भाईचारा बढ़ाएगा।

न्याय की अवधारणा में सामाजिक (Social), आर्थिक (Economic) और राजनीतिक (Political) न्याय (Justice) की त्रिमूर्ति शामिल है। भाईचारा का उद्देश्य है व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करना है।

नागरिक के प्रकार (Types of Citizen in Hindi)

नागरिक के प्रकार (Types of Citizen in Hindi)
नागरिक के प्रकार (Types of Citizen in Hindi)

‘नागरिक कितने प्रकार के होते हैं? (Types of Citizen in India)’। नागरिक दो प्रकार के होते है जो निम्नलिखित है।

जन्मजात नागरिक (Born Citizen)

जन्मजात नागरिक वे हैं जो जिस देश में जन्म लिया है वे ही अपने देश के नागरिक होते हैं। इनको कोई भी अलग से क़ानूनी करवाई नहीं होती है।

इन्हें आसानी से मतदान का अधिकार (Rights), स्वतंत्रता (Freedom), न्याय (Justice), यात्रा की स्वतंत्रता, किसी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता (Equality), चुनाव (Election) लड़ना, कोई सरकारी पद ग्रहण करना, कोई पार्टी बनाना, सरकार का विरोध या समर्थन करना आदि।

राजक्रित नागरिक (Royal Citizen)

राजक्रित नागरिक वह होते है जो जन्म से तो किसी दूसरे राज्य के नागरिक होते हैं, लेकिन किसी दूसरे राज्य की कानूनी आवश्यकताएं पूरी करने के बाद उन्हें वहां की नागरिकता मिल जाती है। जैसे बहुत से भारतीयों को इंग्लैंड में वहाँ की राजक्रित नागरिकता मिली है।

इसी तरह कुछ विदेशियों ने भारत के कानूनों के अनुसार भारत की नागरिकता प्राप्त की है। आमतौर पर जन्मजात नागरिक और राजक्रित नागरिकों को एक ही स्तर पर व्यवहार किया जाता है।

लेकिन कई देशों में, राजक्रित नागरिकों की तुलना में जन्मजात नागरिकों को ज्यादा अधिकार दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में, केवल जन्मजात नागरिक ही राष्ट्रपति चुनाव लड़ सकते हैं।

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भारतीय नागरिक के मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties of Citizens in Hindi)

भारतीय नागरिक के मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties of Citizens in Hindi)
भारतीय नागरिक के मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties of Citizens in Hindi)

‘भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्य’ भारत में हर साल 26 नवंबर को ‘संविधान दिवस’ मनाया जाता है। क्योंकि भारत के संविधान को 1949 में संविधान सभा द्वारा अनुमोदित (Approved) किया गया था।

जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। भारत का संविधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ कुछ मौलिक कर्तव्यों के बारे में भी बताया गया है।

1976 में अपनाए गए 42 वें संविधान संशोधन ने नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) को सूचीबद्ध किया है।

संविधान के भाग IV में निहित अनुच्छेद 51 ‘A’ मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है। यह नागरिकों को अन्य बातों के अलावा, संविधान का पालन करने, आदर्श विचारों को बढ़ावा देने और पालन (Obedience) करने का आदेश देता है।

भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्यों या मौलिक कर्तव्यों की संख्या 11 है, जो इस प्रकार है।

  1. प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों (Ideals), संस्थाओं (Institutions), राष्ट्रध्वज (National Flag) और राष्ट्रगान (National Anthem) का आदर करें।
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का संरक्षण और पालन करें।
  3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे बरकरार (Intact) रखे।
  4. देश की रक्षा करे।
  5. भारत के सभी लोगों में एकता और समान भाईचारा की भावना का निर्माण करे।
  6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका निर्माण करे।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन (Promotion) करे।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।
  9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे।
  10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
  11. माता-पिता या संरक्षक द्वार 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना (86वां संशोधन)।

भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights of Indian Citizen in Hindi)

भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights of Indian Citizen in Hindi)
भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights of Indian Citizen in Hindi)

मौलिक अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता है। जो किसी व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक हैं। यह अधिकार संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं।

जिनमें राज्य द्वार हस्तक्षेप नही किया जा सकता हैं। ये ऐसे अधिकार हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिये आवश्यक हैं और जिनके बिना मनुष्य अपना पूर्ण विकास नही कर सकता हैं।

मौलिक अधिकार को भारतीय संविधान का मैग्नाकार्टा (Magna Carta) कहा जाता है। सर्वप्रथम 1215 ई० में इंग्लैण्ड का सम्राट जॉन के द्वारा अपने सामन्तों (Nobles and Barons) को दिया गया अधिकार एवं स्वतंत्रता को मैग्नाकार्टा कहा जाता है।

  • मौलिक अधिकार के माध्यम से ही फ्रांस की क्रांति की देंन है की स्वतंत्रता (Freedom), समानता (Equality) और बंधुत्व (Fraternity) सम्बन्धित अधिकार भारतीय नागरिकों को प्राप्त होता है।
  • नागरिकों को सामाजिक (Social), राजनैतिक (Political), आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Freedom) और समान्तर मौलिक अधिकार के माध्यम से ही प्राप्त होता है।
  • राज के विरुद्ध नागरिकों को दिया गया अधिकार मौलिक अधिकार है। जो प्राकृतिक प्रदत अधिकार को संवैधानिक मान्यता है।
  • सर्वप्रथम USA के संविधान में मौलिक अधिकार को शामिल किया गया। जिसकी संख्या 10 थी। जबकि भारतीय संविधान में 7 मौलिक अधिकार को शामिल किया गया।
  • अनुच्छेद 31A के विभिन्न उपखंड एवं A19f के द्वारा भारतीय नागरिक को दिया गया सम्पति के अधिकार को 44 वाँ संविधान संसोधन के द्वारा 1978 में मौलिक अधिकार से अधिक दर दिया गया। उसे विधिक अधिकार के रूप में उसे A 300 A के अंतर्गत शामिल किया गया।
  • 86 वाँ संविधान संशोधन के द्वारा 2002 में एक और मौलिक अधिकार को A21 Q के अंतर्गत शिक्षा के अधिकार के रूप में शामिल किया गया। शिक्षा का अधिकार 1april 2010 को लागु हुआ था।

भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों से कुछ जुड़े तथ्‍य इस प्रकार हैं।

  • मौलिक अधिकार को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
  • इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) है।
  • इसमें संशोधन हो सकता है और राष्ट्रीय आपात के दौरान (अनुच्छेद 352) जीवन एवं व्यकितिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है।
  • मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे। लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1979 ई०) के द्वारा संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31 से अनुच्छेद 19 f) को मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अन्तगर्त क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है।

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भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित मूल या मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

1. समता या समानता का अधिकार (Right to Equality in Hindi)

समता या समानता का अधिकार (Right to Equality in Hindi)
समता या समानता का अधिकार (Right to Equality in Hindi)
  • अनुच्छेद 14 : अनुच्छेद 14 के अनुसार कोई भी राज्य सही व्यक्तियों के लिए एक समान कानून बनाएगा और उन पर एक समान ढंग से उन्‍हें लागू करेगा।
  • अनुच्छेद 15 : अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेद- राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग एवं जन्म-स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 16 : अनुच्छेद 16 के अनुसार सार्वजनिक रोजगार के विषय में अवसर की समानता – राज्य के तहत एक पद की योजना या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।
  • अनुच्छेद 17 : अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता या छुआछूत का अंत – इसे अस्पृश्यता या छुआछूत (Untouchability) के उन्मूलन (Elimination) के लिए दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
  • अनुच्छेद 18 : अनुच्छेद 18 के अनुसार उपाधियों का अंत – कोई भी राज्य सेना को और शिक्षा के सम्बन्धित उपाधि कर सकता है। लेकिन राज्य अन्य कोई भी उपाधि प्रदान नहीं करेगा।

2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom in Hindi)

स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom in Hindi)
स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom in Hindi)

अनुच्छेद 19

अनुच्छेद 19 – के मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था। लेकिन अब सिर्फ 6 हैं।

  1. 19 (a) बोलने की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता।
  2. 19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता।
  3. 19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता।
  4. 19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता।
  5. 19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता।
  6. 19 (f) संपत्ति का अधिकार और कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 20

अनुच्छेद 20 – अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के संबंध में संरक्षण- इसके तहत तीन प्रकार की स्वतंत्रता का वर्णन है।

  1. किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए सिर्फ एक बार ही सजा मिल सकती है।
  2. अपराध करने के समय जो कानून है। इसी के तहत सजा मिलेगी न कि पहले और और बाद में बनने वाले कानून के तहत।
  3. किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध न्यायालय में गवाही देने के लिय बाध्य नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 21

अनुच्छेद 21- प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का सरंक्षण

किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रकिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 21 A

6-14 वर्ष तक के बच्चे को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार जो 1 April से 2010 से लागु हुआ है।

अनुच्छेद 22

कुछ अवस्था में अपने को गिरफ्तार किये जाने से बछ्ने का अधिकार एवं गिरफ्तार किये जाने पर 24 घंटा के अन्दर न्यायलय में अपने को उपस्थित किये जाने का अधिकार है। अगर किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया गया हो, तो उसे तीन प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

  1. हिरासत में लेने का कारण बताना होगा।
  2. 24 घंटे के अंदर (आने जाने के समय को छोड़कर) उसे दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया जाएगा।
  3. उसे अपने पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद 23 A

बलात श्रम (Forced Labor) एवं मानव अंगों का क्रय-विक्रय करने पर प्रतिबंध है। इसी अधिकार के अधार पर गुलामी-प्रथा अर्थात बंधुआ मजदूर, वेश्यावृति को प्रतिबंधित किया गया है।

अनुच्छेद 24 A

14 वर्ष के बच्चे को कारखाना सहित कही भी कार्य पर नहीं लगाये। लेकिन स्कुल से आने के बाद वह अपने माता-पिता के साथ पारिवारिक कार्य कर सकता है।

अनुच्छेद 25 A

स्वेच्छा से किसी भी धर्म को स्वीकार करने एवं उसका प्रचार-प्रसार करने का अधिकार है।

अनुच्छेद 26 A

धर्म के आधार पर जीवन-यापन करने एवं धार्मिक क्रिया-कलाप में भाग लेने का अधिकार, इसी अधिकार के आधार पर सिख लोग पगड़ी एवं तलवार रखते है।

अनुच्छेद 27 A

धार्मिक दान दिए जाने पर, कर में छुट प्राप्त करने का अधिकार एवं जबरन किसी धर्म विशेष को चंदा नहीं दिए जाने का अधिकार है।

अनुच्छेद 28 A

सार्वजानिक शिक्षण संस्थान में किसी धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दिए जाने का अधिकार है।

अनुच्छेद 29 A

अल्पसंख्यक समुदाय (धर्म एवं भाषा के आधार पर के लोगो को अपने धर्म, संस्कृति, पहचान इत्यादि) को सुरक्षित रखने का अधिकार है।

अनुच्छेद 30 A

अल्पसंख्यक समुदाय के लोगो को अपने धर्म, संस्कृति, भाषा को बढ़ावा देने के लिए निजी शिक्षण संस्थान को स्थापित करना एवं उसका प्रशासनिक कार्य को पूरा करने का अधिकार है।

नोट : – भारत सरकार ने धर्म के अधार पर, मुस्लिम, इसाई, सिख, बौद्ध, पारसी एवं जैन को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है।

अनुच्छेद 32 A

संवैधानिक उपचार का अधिकार इस अधिकार को डॉ भीमराव आंबेडकर ने भारतीय संविधान का आत्मा एवं हृदय कहा है। अनुच्छेद 32 A के आधार पर ही मौलिक अधिकार के संरक्षण में न्यायलय में कोई भी नागरिक मुकदमा कर सकता है एवं 32 A व 139 A के अधारपर S.C और 226 A के अधार पर H.C मौलिक अधिकार के संरक्ष्ण में पांच प्रकार का आदेश जारी करता है। जो इस प्रकार है-

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकर – अर्थात बंदी बांये गए व्यक्ति को वैक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए 24घंटा के अंदर न्यायलय में उपस्थित करने के लिए दिया गया आदेश।
  2. अधिकार पृच्छा – अर्थात अयोग्य व्यक्ति को लोक पद धारण करने से रोकने के लिए दिया गया आदेश।
  3. परमादेश – लोक पदाधिकारी को अपना कर्तव्य ईमानदारीपूर्वक समय से पूरा करने के लिए दिया गया आदेश।
  4. उत्प्रेसन – अधिन्सय न्यायलय में लम्बित मुकदना को शीघ्र सुनवाई के लिए अपने पास मंगवाने के लिए दिया गया आदेश।
  5. प्रतिषेध – लोअर कोर्ट को अपने अधिकार सीमा में रह कर कार्य करने के लिय दिया गया आदेश।
निवारक निरोध कानून (Preventive Detention Law in Hindi)

भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड 3, 4, 5 और 6 के संबंध में उल्लिखित हैं। निवारक निरोध कानून के तहत, अपराध करने से पहले किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है।

निवारक निरोध का उद्देश्य व्यक्ति को अपराध के लिए दंडित करना नहीं है, बल्कि उसे अपराध करने से रोकना है। वस्तुतः यह निवारक निरोध राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था बनाए रखने या भारत संबंधी कारणों से हो सकता है। जब किसी व्यक्ति निवारक निरोध की किसी विधि के अधीन गिरफ्तार किया जाता है, तब-

  1. सरकार ऐसे व्यक्ति को केवल 3 महीने तक जेल में रख सकती है।
  2. अगर गिरफ्तार व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय के लिए जेल में रखना हो, तो इसके लिए सलाहकार बोर्ड का प्रतिवेदन प्राप्त करना पड़ता है।
  3. इस प्रकार निरुद्ध व्यक्ति को यथाशीघ्र निरोध के आधार पर सूचित किए जाएगा, लेकिन जिन तथ्यों को निरस्त करना लोकहित के विरुद्ध समझा जाएगा उन्हें प्रकट करना आवश्यक नहीं है।
  4. निरुद्ध व्यक्ति को निरोध आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए शीघ्रातिशीघ्र अवसर दिया जाना चाहिए।
निवारक निरोध से संबंधित अब तक बनाई गई विधियां इस प्रकार है।
  • निवारक निरोध अधिनियम, 1950 को भारत की संसद ने 26 फरवरी, 1950 को पहला निवारक निरोध अधिनियम पारित किया था। इसका उद्देश्य राष्ट्र विरोधी तत्वों को भारत की प्रतिरक्षा के प्रतिकूल कार्य से रोकना था। इसे 1 अप्रैल, 1951 को समाप्त हो जाना था। किन्तु समय-समय पर इसका जीवन काल बढ़ाया जाता रहा था।अंततः यह 31 दिसंबर, 1971 को समाप्त हुआ।
  • आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम, 1971 में 44वें सवैंधानिक संशोधन इसके प्रतिकूल था और इस कारण अप्रैल, 1979 में यह समाप्त हो गया।
  • विदेशी मुद्रा संरक्षण व तस्करी निरोध अधिनियम, 1974 में पहले इसमें तस्करों के लिए नजरबंदी की अवधि 1 वर्ष थी। जिसे 13 जुलाई, 1984 ई० को एक अध्यादेश के द्वारा बढ़ाकर 2 वर्ष कर दिया गया है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 में जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त अन्य सभी राज्यों में लागू किया गया।
  • आतंकवादी एवं विध्वंसकारी गतिविधियां निरोधक कानून में निवारक निरोध व्यवस्था के अन्‍तर्गत अब तक जो कानून बने उन में यह सबसे अधिक प्रभावी और अत्यंत कठोर कानून था। 23 मई, 1995 को इसे समाप्त कर दिया गया।
  • “पोटा” इसे 25 अक्टूबर, 2001 को लागू किया गया। ‘पोटा’ टाडा का ही एक रूप है।इसके अन्तर्गत कुल 23 आंतकवादी गुटों को प्रतिबंधित किया गया है। आंतकवादी और आंतकवादियों से संबंधित सूचना को छिपाने वालों को भी दंडित करने का प्रावधान किया गया है। पुलिस शक के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है, किन्तु बिना आरोप-पत्र के तीन महीने से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती। पोटा के तहत गिरफ्तार व्यक्ति हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है। लेकिन यह अपील भी गिरफ़्तारी के तीन महीने बाद ही हो सकती है। 21 सितम्बर, 2004 को इसे अध्यादेश के द्वारा समाप्त कर दिया गया दिया गया।

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3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation in Hindi)

शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation in Hindi)
शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation in Hindi)

भारत में कई शताब्दीयों से दास प्रथा का प्रचलन रहा है। जिसके अंतर्गत हरिजन, खेतिहर, मजदूरों, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार होते रहे है।

संविधान के अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 द्वारा सभी नागरिकों को शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation Explained in Hindi) प्रदान किया गया है। मौलिक अधिकारों में से एक शोषण के विरुद्ध अधिकार में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं।

अनुच्छेद 23: मानव के क्रय विक्रय और बलात श्रम पर रोक लगाना!

इसके द्वारा किसी व्यक्ति की खरीद-बिक्री, बेगारी तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है। जिसका उल्लंघन विधि के अनुसार दंडनीय अपराध है।

अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन (Planning) पर रोक लगाना

14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

बाल श्रम अधिनियम 2016

एक बार फिर बाल श्रम संसोधन अधिनियम (2016) द्वारा बाल श्रम संसोधन अधिनियम (1986) को संसोधित किया गया। इसे संसोधित कर इसका नाम बाल एवं किशोर श्रम अधिनियम (1986) कर दिया।

यह अधिनियम 14 वर्ष से कम आयु के बच्चो को हर तरह के व्यवसायों में रोजगार निषिद्ध करता है। इसके अंतर्गत पहले 18 व्यवसायों व 65 प्रक्रियाओं पर लागू था। बाल श्रम संसोधन अधिनियम (2016) के द्वारा 14-18 वर्ष के बच्चो को बेहद खतरनाक एवं प्रक्रियाओं में रोजगार निषिद्ध करता है।

बाल श्रम संसोधन अधिनियम का उल्लंघन करने वालो के लिए सजा का प्रावधान भी है।

  • 6 माह से 2 वर्ष तक की कैद अथवा 20000-50000 तक का जुर्माना।
  • पुन: पकड़े जाने पर सजा की अवधि 1-3 वर्ष की होगी।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion in Hindi)

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion in Hindi)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion in Hindi)

हमारा देश एक प्रजातंत्र राज्य है। यह एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। संविधान में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मविहीन या धर्मविरोधी अवधारणा नहीं है।

इसका केवल यही अर्थ है कि राज्य का कोई धर्म नहीं है, सभी धर्मों को समान आदर तथा संरक्षण प्राप्त है। धर्म के आधार पर किसी के साथ विभेद नहीं किया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की पूर्ण तथा समान स्वतंत्रता की गारंटी प्राप्त है।

अनुच्छेद 25 से 28 में सभी व्यक्तियों को धर्म के सभी पक्षों में स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी का व्यवस्था किया गया है।

अनुच्छेद 25

इसमें अंत:करण की और धर्म को अबाध (Free) रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।

अनुच्छेद 26

इसमें धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता है। व्यक्ति को अपने धर्म के लिए संथाओं की स्थापना व पोषण करने, विधि-सम्मत सम्पत्ति के अर्जन, स्वामित्व व प्रशासन का अधिकार है।

अनुच्छेद 27

इसमें धार्मिक दान दिए जाने पर, कर में छुट प्राप्त करने का अधिकार एवं जबरन किसी धर्म विशेष को चंदा नहीं दिए जाने का अधिकार है। राज्य किसी भी व्यक्ति को बाध्य नहीं किया जा सकता है। जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई है।

अनुच्छेद 28

किसी भी धर्म विशेष को यह अधिकार नहीं है की वह सार्वजानिक शिक्षण संस्थान में किसी विशेष धर्म की शिक्षा नहीं दे सकता है।

5. संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार (Rights Related to Culture and Education in Hindi)

संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार (Rights Related to Culture and Education in Hindi)
संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार (Rights Related to Culture and Education in Hindi)

संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों की संस्कृति और शिक्षा अधिकारों से संबंधित हैं। इस अनुच्छेद में डॉ प्रकार के अल्पसंख्यकों की चर्चा की जाती है।

पहला धार्मिक अल्पसंख्यक और दूसरा भाषायी अल्पसंख्यक। संविधान दोनों प्रकार के अल्पसंख्यकों को उनकी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को बचाने और विकसित करने में सक्षम बनाता है।

अनुच्छेद 29

कोई भी अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकता है। केवल भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर उसे किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा।

अनुच्छेद 30

कोई भी अल्पसंख्यक वर्ग अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्था चला सकता है और सरकार उसे अनुदान देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेगी।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies in Hindi)

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies in Hindi)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies in Hindi)

‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’ को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है।

अनुच्छेद 32

इसके तहत मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है। इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट निकालने की शक्ति प्रदान की गई है। जो निम्नलिखित हैं।

(1) बंदी प्रत्यक्षीकरण

यह उस व्यक्ति के अनुरोध पर जारी किया जाता है। जिसे लगता है कि उसे अवैध रूप से बंदी बना लिया गया है। इसके द्वारा, अदालत उस अधिकारी को आदेश देती है जो हिरासत में लिए गए व्यक्ति को एक निश्चित स्थान पर और एक निश्चित समय के भीतर प्रस्तुत करने के लिए है। ताकि अदालत हिरासत के कारणों पर विचार कर सके।

(2) परमादेश

परमादेश का लेख तब जारी किया जाता है। जब कोई अधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं करता है। इस प्रकार के आज्ञापत्र (Decree) के आधार पर, अधिकारी को अपना कर्तव्य निभाने का आदेश जारी किया जाता है।

(3) प्रतिषेध लेख

यह आदेश उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों और अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी करते हुए दिया है कि इस मामले में अपने यहां कार्यवाही न करें क्यूंकि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है।

(4) उत्प्रेषण

इसके बाद, अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) को निर्देशित किया जाता है कि उनके पास जो लम्बे समय से जो मामला यानि केस पड़ा हुआ है। वे उन मुकदमों के न्याय निर्णयन के लिए उससे वरिष्ठ न्यायालय को भेजें।

(5) अधिकार पृच्छा लेख

जब कोई व्यक्ति एक ऐसे अधिकारी के रूप में काम करना शुरू कर देता है। जिसे कानूनी रूप से कार्य करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय अधिकार-पृच्छा के आदेश के द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है कि वह किस अधिकार से काम कर रहा है। जब तक वह इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं देता वह काम नहीं कर सकता है।

सभी मौलिक अधिकार भारतीयों के लिए है। जबकि अनुच्छेद 14, 20, 21, 23, से लेकर 28 और 32 तक का मौलिक अधिकार भारतियों के साथ-साथ विदेशियों को भी प्राप्त है।

  • अनुच्छेद 13 यदि मौलिक अधिकार से बेमेल कानून का निर्माण राज विधान मंडल करता है, तो S.C या H.C उस कानून को रद्द कर देता है।
  • अनुच्छेद 33 लोक प्रशासन अर्थात शांति व्यस्था को बनाए रखने के लिए राज मौलिक अधिकार को विलम्बित कर सकता है।
  • अनुच्छेद 34 सैनिक प्रशासन वाले क्षेत्र में मौलिक अधिकार को निलम्बित करने से सम्बन्धित विधि का निर्माण संसद कर सकता है।
  • अनुच्छेद 35 मौलिक अधिकार को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए संसद विधि का निर्माण कर सकता है।
  • अनुच्छेद 359 के आधार पर राष्ट्रिय आपातकाल में राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 एवं अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकार को छोड़ कर शेष अभी मौलिक अधिकार को राष्ट्रपति निलम्बित कर सकता है और यदि विदेशी आक्रमण के आधार पर राष्ट्रिय अपातकाल को लागु किया हो, तो अनुच्छेद 19 का मुल्क अधिकार स्वत: अनुच्छेद 358 के आधार पर निलम्बित हो जाता है।
  • गोलकनाथ V / S (बनाम) पंजाब राज विवाद में S.C ने यह निर्णय दिया की संसद मौलिक अधिकार में संशोधन नहीं कर सकती है। लेकिन केशवानन्द भारती V / S केरल राज विवाद में S.C ने निर्णय दिया की संसद A-368 के आधार पर मौलिक अधिकार सहित संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकता है। लेकिन संविधान के मूल भावना के ढ़ाचा में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
  • 24 वाँ संविधान संशोधन के द्वारा 1971 में यह प्रावधान किया गया की संसद मौलिक अधिकार सहित संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकता है।
  • अनुच्छेद 14 विधि के समझ समानता का अधिकार अर्थात कानून किसी भी नागरिक के साथ भेद-भाव नहीं करेगा। (सभी मौलिक अधिकार USA के संविधान से लिया गया है। जबकि अ-14 के मौलिक अधिकार इंग्लैण्ड के संविधान से लिया गया है।)
  • अनुच्छेद 15 जाती, धर्म, भाषा एवं लीग के आधार पोअर किसी भी नागरिकों के बिच भेद-भाव नहीं किये जाने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 16 अवसर की समानता अर्थात सभी नागरिकों को उसकी योग्यता या कार्य क्षमता के अधार पर समान अवसर उपलब्ध करना या योग्यता के अधारपर किसी भी पद को प्राप्ति करने का समान अवसर उपलब्ध होना। लेकिन समान प्रतिनिधत्व देने के लिए समाज का पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 17 अस्प्रश्यत अर्थात छुआ-छूतको कही भी स्वीकार नहीं किये जाने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 18 विशेषधिकार समपन्न उपाधियों को समाप्त किये जाने का अधिकार लेकिन राज या सरकार शिक्षा, सैनिक क्षेत्र में जैसे:- भारत रत्न, परमवीर चक्र आदि पुरस्कार दे सकता है।

मौलिक अधिकार में संशोधन (Fundamental Rights Amendment in Hindi)

मौलिक अधिकार में संशोधन (Fundamental Rights Amendment in Hindi)
मौलिक अधिकार में संशोधन (Fundamental Rights Amendment in Hindi)
  1. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1976) के निर्णय से पूर्व दिए गए निर्णय में यह निर्धारित किया गया था कि संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है। जिसमें अनुच्छेद 368 और मूल अधिकार को शामिल किया गया था।
  2. सर्वोच्च न्यायालय ने गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्यवाद (1967) के निर्णय में अनुच्छेद 368 में निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से मूल अधिकारों में संशोधन पर रोक लगा दी। यानी कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती है।
  3. 24वें संविधान संशोधन (1971) द्वारा अनुच्छेद 13 और 368 में संशोधन किया गया। यह निर्धारित किया गया की अनुच्छेद 368 में दी गई प्रक्रिया द्वारा मूल अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है।
  4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्यवाद के निर्णय में इस प्रकार के संशोधन को विधि मान्यता प्रदान की गई यानी कि गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के निर्णय को निरस्त कर दिया गया।
  5. 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368 में खंड 4 और 5 जोड़े गए तथा यह व्यवस्था की गई कि इस प्रकार किए गए संशोधन को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है।
  6. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) के निर्णय के द्वारा यह निर्धारित किया गया कि संविधान के आधारभूत लक्षणों की रक्षा करने का अधिकार न्यायालय को है।न्यायालय इस आधार पर किसी भी संशोधन का पुनरावलोकन (Review) कर सकता है। इसके द्वार 42वें संविधान संशोधन द्वारा की गई व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया गया।

नागरिकता का अर्थ (Meaning of Citizenship in Hindi)

नागरिकता (CITIZENSHIP) का अर्थ है- नागरिकता (Citizenship) एक विशेष सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय, या मानव संसाधन समुदाय का एक नागरिक होने की अवस्था है।

‘नागरिकता क्या है?’ नागरिकता लोकतांत्रिक राजनीति के मूल अपरिहार्य सिद्धांत को वैधता प्रदान करती है। यह प्रतीक है कि व्यक्ति के पास राज्य की पूर्ण राजनीतिक सदस्यता है। नागरिकता एक कानूनी रिश्ते का नाम है जो किसी व्यक्ति को उस राज्य से जोड़ता है जिसका वह सदस्य हैं।

“नागरिकता किसी व्यक्ति के राज्य को संदर्भित करती है। जिसके कारण वह अपने राज्य में राष्ट्रीय और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग कर सकता है और अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने के लिए तैयार हो सकता है।

‘नागरिकता क्या है?’ सरल शब्दों में, हम कह सकते हैं कि नागरिकता एक गुण है जो देश के साथ व्यक्ति के रिश्ते को दर्शाता है और राज्य के नागरिकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को निर्धारित करता है।

नागरिकता प्राप्त करने के उपाय या माध्यम (Nagrikta Prapt Karne ke Upay)

  1. जन्मजात नागरिकता (Birth Citizenship)- जन्मजात नागरिकता (Birth Citizenship) वह हैं जो जिस देश या राज्य में जन्म लिया है वे ही अपने देश के नागरिक (Citizen) होते हैं। इनको कोई भी अलग से क़ानूनी करवाई नहीं होती है। इन्हें आसानी से मतदान का अधिकार (Right to Vote), स्वतंत्रता (Freedom), न्याय (Justice), यात्रा की स्वतंत्रता (Freedom of Travel), किसी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता (Freedom of Religion), कानून के समक्ष समानता (Equality Before the Law), चुनाव लड़ना (Contest), कोई सरकारी पद ग्रहण करना, कोई पार्टी बनाना (Make a Party), सरकार का विरोध (Oppose the Government) या सरकार का समर्थन करना (Support the Government) आदि ये सब कर सकते है।
  2. वंशानुगत या आनुवंशिक नागरिकता (Hereditary or Genetic Citizenship)- यदि माता-पिता भारतीय (Indian) है और बच्चे का जन्म विदेश (Foreign) में भी होता है तो उसके बच्चे को भी भारत की नागरिकता (Citizenship) प्राप्त होती है।
  3. पंजीकरण (Registration)- यदि NRI (Non-Resident Indian), अविभाजय भारत का नागरिक भारतियों से विवाह कर चूका है। यानि एक विदेशी नागरिक जो पिछले 7 वर्षों से भारत में रह रहा हो और वह एक भारतीये लड़की से विवाह कर चूका है, तो अगर वह नागरिकता की मांग करता है तो उसे भारत की नागरिकता दी जा सकती है।
  4. देशीयकरण (Naturalization)- यदि कोई विदेशी जो पिछले 14 वर्षों से भारत में रह रहा हो और भारत का राजभाषा में से किसी एक का ज्ञान रखता हो तो वह नागरिकता की मांग करता है तो उसे नागरिकता दी जा सकती है।
  5. विलय के द्वारा- यदि किसी विदेशी क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाता है, तो वहाँ के नागरिको को भारत की नागरिकता प्राप्त होती है।

नागरिकता समाप्त होने के कारण (Due to Expiry of Citizenship in India)

  • यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से भारत की नागरिकता का त्याग किया हो या किसी अन्य देश की नागरिकता को प्राप्त किया हो तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  • यदि कोई भारतीय नागरिक बिना सुचना के पिछले 7 वर्षों से भारत से बहार रह गया हो, तो उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  • यदि कोई भारतीय नागरिक बिना सरकार के अनुमति से विदेशी सरकार के सेवा के पद को ग्रहण कर लिया हो तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।

हमारे भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 5-11 में नागरिकता के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य!

  • अनुच्छेद 5- भारत सरकार अधिनियम 1935 के आधार पर स्वतंत्रता के समय सभी भारतीये नागरिक को संविधान के द्वारा भारत का नागरिक स्वीकार किया गया है।
  • अनुच्छेद 6- अविभाजित भारत का नागरिक विभाजन के बाद 19 जुलाई 1948 तक यदि भारत वापस लौट आया o उसे भारत का नागरिक माना गया।
  • अनुच्छेद 7- भारत विभाजन के पश्चात पाकिस्तान चले गए लोगों की भारत की नागरिकता समाप्त कर दी गई।
  • अनुच्छेद 8- अप्रवासी भारतीये (NRI) को भारत की नागरिकता दी जा सकती है।
  • अनुच्छेद 9- यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेचछा से भारत की नागरिकता का त्याग किया हो या अन्य देश की नागरिकता को प्राप्त किया हो तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  • अनुच्छेद 10- भार्तिय्ये नागरिको को दिया गया अधिकार भविष्य में भी निरंतर बना रहेगा।
  • अनुच्छेद 11- नागरिकता से सम्बन्धित विधि का निर्माण संसद के द्वारा किया जाएगा।

इन्हें भी देखे –


निष्कर्ष (Conclusion)

‘नागरिकता क्या है?’ नागरिकता (Citizenship) एक विशेष सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय, या मानव संसाधन समुदाय का एक नागरिक होने की अवस्था है। नागरिकता में, सामाजिक समझौता के सिद्धांत के तहत, अधिकार और जिम्मेदारियां दोनों शामिल हैं।

नागरिकता क्या है? “सक्रिय नागरिकता” का दर्शन अर्थात् नागरिकों को सभी नागरिकों के जीवन में सुधार करने के लिए आर्थिक सहभागिता, सार्वजनिक, स्वयंसेवी कार्य और इसी प्रकार के प्रयासों के माध्यम से अपने समुदाय को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।

“नागरिकता क्या है?” नागरिकता एक नागरिक एक राजनीतिक समुदाय का एक सहभागी सदस्य होता है। राष्ट्रीय, राज्य या स्थानीय सरकार की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करके नागरिकता प्राप्त की जाती है। एक राष्ट्र अपने नागरिकों को कुछ अधिकार और विशेषाधिकार देता है।

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Karuna Tiwari is an Indian journalist, author, and entrepreneur. She regularly writes useful content on this blog. If you like her articles then you can share this blog on social media with your friends. If you see something that doesn't look right, contact us!

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