संचार क्या है? (Communication in Hindi)

विषय-सूची

संचार क्या है? (What is Communication in Hindi)

क्या आप जानते हैं की “संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)” और मनुष्य, पशुओं और पक्षियों के बीच संचार कैसे होता है?

अगर आपको संचार क्या है? (Communication in Hindi) के बारे में नहीं पता हैं। तो इस पोस्ट में मै आपको संचार क्या हैं? पूरी जानकारी दे रही हूँ।

तो चलिए जानते हैं  की “संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai) “, “संचार का अर्थ (Meaning of Communication in Hindi)”, “संचार का परिभाषाएं (Definition of Communication in Hindi)”, “संचार के तत्व (Elements of Communication in Hind)” आदि।

संचार क्या है? (What is Communication in Hindi)
संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)

संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)

“संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)” मानव समाज में ‘संचार‘ की उपयोगिता और उसके महत्त्व का अध्ययन करने के लिए हमें मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणियों को भी देखना होगा।

क्योंकि मानव भी एक प्राणी हैं। ‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’

हमारा विज्ञान कहता हैं की मानव और पृथ्वी के अन्य प्राणियों में सिर्फ सोच-विचार की शक्ति या बोलने और अपनी बात को समझाने की क्षमता में अंतर हैं।

“संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)” पशु-पक्षियों में भी ‘संचार‘ होता हैं।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ अक्सर देखा जाता हैं की जब भी कभी कोई खतरा दिखाई देता हैं तो कई पक्षी शोर मचाना शुरू कर देते हैं।

“संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)” उदहारण के जरिये समझते है।

(क) जब सुनामी आती है। तब कौए, समुंदरी जानवर, पालतू जानवर ये सब भागने लगते हैं और पक्षियाँ चहकने लगती हैं।

ये सब एक-दुसरे को संचार के माध्यम से बताते हैं की दूरघटना तेजी से आ रही है। उन्हें भागना चाहिए।

(ख) ‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ अन्य प्राणियों को देखे तो हिरनों, हाथियों, भेडियों और जिराफो में भी परस्पर संचार के अपने-अपने तरीके हैं।

ये जानवर हमेशा झुंड बना कर ही चलते है और जब किसी शिकारी या हिंसक पशु का खतरा महसूस करते हैं।

तो अपने परिवार या झुंड के सभी सदस्यों को सचेत कर देते है।

संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai) “संचार” मनुष्य और प्राणियों के जीवन का अभिन्न अंग है। सृष्टी के सभी प्राणियों में संचार होता हैं।

संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai) जिव-जंतु और मानव में संचार करने का अलग तरीका है।

उदाहरण

क.>  एक मधुमाखी नाचने की विभिन ढंगों से अन्य मधुमखियों को भोजन के बारे में या कितनी दूरी पर भोजन है ये जानकारी सूचित करती है

ख.> चीटियाँ भी समान रूप से अपना काम मधुमखियों जैसा ही करती है

ग.> नेत्रहीन लोग स्पर्श (छू कर) द्वारा ब्रेललिपी को पढ़ लेते है

संचार का अर्थ (Communication Meaning in Hindi)

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ संचार शब्द ‘संस्कृत’ के ‘चर्’ धातु से बना हैं। जिसका अर्थ है “चलाना”। “यानि साझेदारी में चलाना”।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ इसका व्यापक अर्थ में इसका प्रयोग चलने, दौड़ने जैसी क्रियाओं के लिए होता है।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ लेकिन आज ‘संचार’ शब्द एक तकनीकी शब्द बन चुका है।

यह अंग्रेज़ी के कम्युनिकेशन (Communication Meaning in Hindi) का हिंदी रूपांतर है।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ यह शब्द वास्तव में लैटिन भाषा की ‘Communication’ क्रिया  से निकलकर आया हैं।

जिसका आशय है “To Take Together, Confer, Discourse and Consult on With Another ” यह लैटिन भाषा के ‘कम्युनिकेस’ शब्द  भी जुड़ता है।

जिसका अर्थ हैं – ‘To Take Common, to Share, to Import, to Transit’ अर्थात सामान्यीकरण, सामान्य भागीदारीयुक्त्त, सुचना, सम्प्रेषण या साँझा आधार भी कह सकते  है।

संचार का परिभाषाएं (Definition of Communication in Hindi)

  1. विल्बरश्रम के अनुसार– संचार में एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह एक साथ अपनी बातों को कहने या समझना।
  2. पीटर लीटर के अनुसार– संचार एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसके माध्यम से सुचना व्यक्तियों या संगठनो के बीच सम्प्रेषित की जाती हैं।
  3. जे. पाल. लिगंस के अनुसार– संचार एक ऐसी प्रक्रिया है, दो या दो से अधिक व्यक्ति विचार तथ्य भावनाओं दोनों की समझ बढे।
  4. सी. एल. लॉयड के अनुसार– संचार ही मानव समाज की संचालन प्रक्रिया को सम्भव करता है।
  5. राबर्ट एंडरसन के अनुसार– बोलना या इशारो के द्वारा अपने विचारों को प्रगट करना संचार कहलाता है।
  6. सी. एल. लॉयड के अनुसार– संचार ही मानव समाज की संचालन प्रक्रिया को सम्भव करता है।
  7. बैरलो के अनुसार– विचारों और संदेशों के आदान-प्रदान को ‘संचार’ कहते है।
  8. ए.बी. शनमुगन के अनुसार– ज्ञान, अनुभव, संवेदना, विचार और यहां तक की अस्तित्व परिवर्तनों की सांझेदारी ही संचार है।
  9. डॉ अर्जुन तिवारी के अनुसार– संचार मनुष्य के स्वभाव का अभिन्न अंग है। वह अपने भावो को शब्द, संगीत, भाव, मुद्रा आदि से ही सम्प्रेषित करता हैं। यह प्रक्रिया संचार कहलाता है।
definition of communication in hindi
संचार का परिभाषाएं (Definition of Communication in Hindi)

संचार का मॉडल (Model of Communication in Hindi)

Model of Communication in Hindi
संचार का मॉडल (Model of Communication in Hindi)

संचार के प्रकार (Types of Communication in Hindi)

आंतरव्यक्ती या स्वागत संचार (Interactive Communication in Hindi)

इस संचार की स्थिति तब उत्पन्न होती है। जब एक व्यक्ति अकेला अपने अन्दर ही अन्दर सोच रहा होता है।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ इसे अन्य सभी संचार-स्तरों का आधार कहा जाता है। क्योकिं कुछ भी बात कहने से पहले आप उसे अपने मन में सोचते हैं।

इस सोचने को आंतरव्यक्ती  कहा जाता हैं।

अंतरव्यक्ति संचार (Interpersonal Communication in Hindi)

यह संचार आमने-सामने बैठकर बातचीत करने की स्थिति में होता हैं।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ इसमें एक संदेश-प्रेषक होता हैं तथा कोई एक व्यक्ति अथवा कुछ लोग सम्मिलित होते हैं।

जो संदेश प्राप्त करता होते है। इसके लिए यह आवश्यक है कि आप एक-दुसरे को जानते हो।

आपसी बातचीत, गपशप, प्रेमालाप, संक्षिप्त समूह-चर्चा, किसी समिति की बैठक आदि।

मध्य संचार (Media Communication in Hindi)

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ यह संचार तब होता हैं।

जब दो या दो से अधिक लोग अपने संदेश भेजने के लिए कुछ माध्यमों का उपयोग करते हैं।

जैसे टेलीफोन, सेल्युलर, मोबाइल फोन, पेजर, क्लोज सर्किट टेलीविजन, मोबाइल, रेडियो, रदर, टेलीटाइप, होम मूवी कैमरा, प्रोजेक्टर तथा संचार सेटेलाइट आदि।

व्यक्ति-से-समूह-संचार (Person-to-Group Communication in Hindi)

इस संचार में एक वक्ता होता है और सामने बैठे हुए कुछ श्रोता होते है। जैसे भाषण, टेपरिकोर्डर आदि।

जनसंचार (Mass Communication in Hindi)

जनसंचारMass Communication in Hindi‘ में संदेश को प्रेषक व्यापक जन-समुदाय के बीच में होता हैं।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ यह व्यापक जन-समुदाय ‘पंचमेल खिचड़ी’ होता हैं।

संचार के निम्नलिखित साधन है

  1. स्रोत (Source)–  किसी भी खबर को या किसी भी व्यक्ति के बातों को दुसरे व्यक्ति के पास पहुंचाने की क्रिया होती है। वह स्रोत है। इसे संचार कहते है।
  2. सन्दर्भ (Context) आपकी बातों का क्या सन्दर्भ ( मतलब) होता है। लोग आपकी बातों को समझ पा रहे है या नहीं।
  3. विषय-वस्तु (Content) विषय-वस्तु के आधार पर श्रोताओ का निर्धारण होता है। क्योकिं स्रोतों को जो संदेश देना चाहते है वो उनको समझ में आना चाहिए।
  4. स्पष्टता (Clarity)– संदेश स्पस्ट होनी चाहिए। उसकी सरल भाषा हो। ताकि सुनने वाला को समझ आये।
  5. माध्यम (Channel)– संदेश को प्राप्तकर्ता तक जल्दी पहुंचाने के लिए नयी-नयी माध्यमों का उपयोग करना चाहिए।
  6. स्रोताओं की क्षमता (Capability of Audience) सम्प्रेषण में श्रोताओ की क्षमताओं, जैसे की  भाषा, संस्कृति इत्यादि को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। ये सब ध्यान में नहीं रखा जाये तो संदेश ही गलत हो जायेगा।

संचार का तत्व (Elements of Communication in Hindi)

संचार के तत्व (Elements of Communication in Hindi)
संचार के तत्व (Elements of Communication in Hindi)
  1. सर्पिल प्रक्रिया (Spiraling Process)– यह प्रक्रिया सर्पिल यानि उतार-चढ़ाव वाली है इसकी प्रकृति गत्यात्मक हैं। इसमें केवल संदेश भेजना और प्राप्त करना ही सम्मिलित नहीं हैं। बल्कि संदेश प्राप्त करने वाले की प्रक्रिया भी शामिल रहती हैं। जिसे प्रतिपुष्टि कहा जाता हैं।
  2. कार्यव्यापार (Transaction)– संचार का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है। संचार की कार्यवाही में “फीडबैक” अनिवार्य तत्व है।
  3. अर्थ (Meaning)– यह संचार का तीसरा महत्त्वपूर्ण तत्व है। लोगो को हर संदेश का अर्थ पता होना चाहिए।
  4. प्रतीकात्मक क्रिया (Symbolic Action)– यह संचार का चौथा मत्वपूर्ण तत्व है। जिसे हम एक तरह से संचार-प्रक्रिया का पर्याय कह सकते है।
  5. प्रेषण और ग्रहण (Sending & Receiving)– संचार के ये दो मुख्य कार्य है। ये दोनों कार्य मानसिक प्रक्रिया से जुड़े है।
  6. संदेश (Message)– यह संदेश का छठा महत्वपूर्ण कार्य है। इसके अंतर्गत  लिखित, मौखिक एवं शब्द आता है।

संचार की अवधारणा (Concept of Communication in Hindi)

  • इशारे– लोग इशारे में भी बात कर के संचार करते हैं।
  • विषयवास्तु– इसी के आधार पर श्रोताओं का निर्धारण होता हैं।
  • स्पष्टता– संदेश सुस्पष्ट होना चाहिए। संदेश की भाषा सरल व योग्य होनी चाहिए।
  • सन्दर्भ– सन्दर्भ संदेश को सुनिशिचित करे, उसमें परस्पर विरोधाभास नहीं दिखाई देना चाहिए। इसमें भागीदारी और दुहराने की समुचित व्यवस्था होती हैं।
  • निरंतरता– सम्प्रेषण समाप्त होने वाली प्रक्रिया है। संदेश को श्रोता तक पहुँचने के लिए उसे लगातार दोहराने पड़ते हैं।
  • माध्यम– केवल उन्ही स्थापित न का ही उपयोंग करना चाहिए। जिन्हें संदेश प्राप्तकर्ता उपयोगी और सार्थक समझता हो।
  • श्रोताओं की क्षमता– सम्प्रेषण में श्रोताओं की क्षमताओं, जैसे की उनकी भाषा, संस्कृति इत्यादि का ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

संचार के कार्य (Functions of Communication in Hindi)

  1. सुचना का प्रसार– ‘सुचना’ और ‘संचार’ परस्पर जुड़े हुए शब्द हैं। बिना ‘सूचना’ के ‘संचार’ की कल्पना नहीं की जा सकती, और बिना ‘संचार’ के सूचना भी अधूरी हैं।
  2. निर्देश– संचार का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है- निर्देश देना। जिस तरह संचार के द्वारा दूर तक जनसमुदाय के बीच संदेश या सूचना पहुंचाने का कम किया है। उसी तरह निर्देश पहुंचाने  कम भी किया जाता है। उदाहरण के लिए – हम मैखिक  से या पत्र से ये निर्देश दिए जा सकते है और लिखित मुद्रित के माध्यम से भी।
  3. मनोरंजन– संचार माध्यम हमारे मनोरंजन का बहुत बड़ा साधन है। हम घर बैठे फ़िल्में देखने, गीत-संगीत का आनन्द लेने, टेलीविजन सीरियल देखने जैसे बहुत से काम संचार के माध्यम से ही करते है।
  4. विश्वाश-अर्जन– संचार के द्वारा हम अपने मतों, विचारों, अवधारणाओं, भावनाओं को एक-दुसरे से बांटते है। एअक-दुसरे से सुख-दुःख में साझेदारी करते हैं, सहायता करते है। इससे हमारा आपस में सहज बनता हैं।
  5. विचार-विमर्श– विचार-विमर्श संचार का आधारभूत कार्य है। विचार-विमर्श से ही हम एक-दुसरे के निकट आते है। एक-दुसरे के विचारों को समझ पाते है। इसके जरीये ही हम एक-दुसरे को नई सूचनाएं भी दे रहे है।
  6. सांस्कृतिक प्रसार– संस्कृतियों में आदान-प्रदान की प्रक्रिया संचार के माध्यमो से चलती रहती है।
  7. भावनात्मक एकता– संचार के माध्यमों द्वारा समाज में भावनात्मक एकीकरण का महत्त् कार्य भी होता है।

मानव एक सामाजिक प्राणी है। उसके लिए अकेला रहना बहुत कठिन कार्य है।

हम समूह या समाज में रहते हैं। हमारी आवश्यकताएं भी असिमित है तो स्वभाविक है की संचार के उद्देश्य भी असीमित है।

अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम संचार का सहारा लेते हैं।

संचार के अवरोधक (Barriers of Communication in Hindi)

  1. मनोवैज्ञानिक– प्रेषक की ओर भेजे गये संदेश के अर्थ-ग्रहण में प्रापक का मनोविज्ञान बहुत काम करता है। कई बार प्रेषक जो संदेश पहुंचाता है। वह उसी रूप में ग्रहण नहीं कर रहा। जिससे संदेश का स्वरूप बदल जाता है। क्योंकि बोला कुछ जाता हैं और उस संदेश को अपनी भाषा में कहा कुछ और जाता हैं। जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
  2. यांत्रिक– हमारी वाक् (Speech) इन्द्रियों के अतिरिक्त ऐसे बहुत से यंत्र हैं। जो प्रभाव पूर्ण ढंग से हमारी बात लोगों तक पहुँचा पाते,आवाज का साफ ना होना यांत्रिक अवरोधक का घटना है।
  3. अर्थ– अर्थ की सामान्य स्वीकृति के बिना प्रेषक और प्रापक के बीच संचार नितान्त असम्भव है।
  4. भौतिक- इसके अंतर्गत प्रेषक और प्रापक के बीच भौतिक दूरी से लेकर समय अन्तराल तक को ले सकते है। दूर खड़ा व्यक्ति पास खड़ा व्यक्ति अपेक्षा कम सुनेगा।
  5. भाषा– हमारे देश में कई प्रकार के भाषा हैं। हर भाषा में अंतर होता हैं। क्षेत्रीय भाषा अलग-अलग है।
  6. संस्कृति– संस्कृति समाज और भाषा का गहन एवं आंतरिक सम्बन्ध होता है। हर समाज की संस्कृति अलग होती है। तो स्वभाविक है आपस में संदेश सम्प्रेष्ण करते समय बढ़ा उत्पन्न होती है।

संचार के माध्यम (Medium of Communication in Hindi)

  1. मुद्रण माध्यम (Print Media)
  2. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (Electronic Medium)

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को दो भागों में बांटा गया।

(क) श्रव्य संचार माध्यम : रेडियो

(ख) दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम : टेलीविजन

संचार के सिद्धांत (Principles of Communication in Hindi)

संचार का विकास भी मानव विकास की कहानी से जुड़ा है। ‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ जब मानव ने प्रागैतिहासिक अवस्था से विकास की यात्रा शुरू की थी।

संचार ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सही अर्थों में, मानव ही संचार प्राणी है। जिसने संचार के माध्यमों से पूरे विश्व को एक गाँव में परिवर्तित कर दिया।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ संचार के विकास के साथ-साथ संचार के सिद्धान्त (Theory) भी विकसित हुआ। ‘सिद्धान्त’ शब्द अंग्रेजी के Theory शब्द का पर्यायवाची है।

जिसे अंग्रेजी में इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं-“A Theory is Someone’s Conceptuali- Sation of an Observed Set of Events.” अर्थात् किसी घटनाक्रम का क्रमवार अवलोकन करके उसका वर्णन करना।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ किसी प्रक्रिया को समझने व उसका वर्णन करने की इच्छा सिद्धान्त को जन्म देती है।

एक दार्शनिक किसी विशेष घटना अथवा परिस्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करके किसी सिद्धान्त (Theory) का निर्माण करता है।

यह एक कठिन कार्य है जो समय, प्रयत्न व केन्द्रीय सूक्ष्म अवलोकन की मांग करता है।

बलेट सिद्धान्त (Bulet Theory)

यह सिद्धान्त पहले विश्वयुद्ध के बाद 1940 में अमेरिका में विकसित हआ। जहां समाज में तेजी से परिवर्तन हो रहे थे।

पारम्परिक समाज शहरीकरण व औद्योगीकरण के रास्ते पर जा रहा था। अमेरिका की आबादी ऐसे लोगों का समूह बन गई थी।

जिसमें आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व मनोवैज्ञानिक तौर पर बहुत असमानताएं थीं।

परिणाम स्वरूप समाज एक बिखरा हुआ समूह या जिसमें आपसी सहयोग व तालमेल कम हो रहा था, हो गया था।

ऐसी स्थिति में नए मास मीडिया का महत्व बढ़ रहा था। लोग एक दूसरे से जयादा मिडिया पर निर्भर रहने लगे थे।

1920 तक Radio संचार का एक घरेलू साधन बन गया था। तिस से चालीस के दशक में पत्र-पत्रिकाएँ, टेलीविजन आया।

समाजशास्त्री एवं जनता मानने लगे थे की मिडिया ऐसे शक्तिशाली हथियार है।जसके द्वारा आम लोगों का विचारों व् व्यवहार में परिवर्तन किया जा सकता है।

इन्हीं धारणाओं ने “मजिक बुलेट थ्योरी” को जन्म दिया। जिसके अनुसार मीडिया संदेश प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर प्रभाव सीधा व तुरंत छोड़ता है।

व्यक्तिगत विभिन्नताओं का सिद्धान्त (Individual Difference Theory)

इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तियों की मनोवैज्ञानिक कार्यप्रणाली (Mechanism) एक-दूसरे से भिन्न होती हैं।

इसलिए विभिन्न व्यक्तियों की एक ही प्रेरक के प्रति विभिन्न प्रतिक्रियाएं होती हैं। यह प्रतिक्रियाएं कई कारकों पर निर्भर करती है।

जैसे कि श्रोता कितने प्रोत्साहित हैं। वे संदेश को ग्रहण करने या अस्वीकार करने के कितने इच्छुक हैं।

उनकी बुद्धिमता, भावुकता, मूल्य, विश्वास, पूर्व धारणाएं, जरूरतें, मिजाज आदि कैसे हैं ?

इस सिद्धान्त को समझने के लिए मनौवैज्ञानिकों ने तीन धारणाएं दी हैं जो

यह वर्णन करती हैं कि लोग मास-मीडिया संदेशों का कैसे सामना करते हैं :-

  1. चयनित दृष्टिकोण (Selective Perception)
  2. चयनित धारण शक्ति (Selective Retention)
  3. चयनित अनावरण (Selective Exposure)

संज्ञानात्मक असन्तुलन सिद्धान्त (Cognitive Dissonance Theory)

यह सिद्धान्त अमेरिका के वैज्ञानिक लिओन फेस्टिगर द्वारा 1957 में दिया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार लोग उन सूचनाओं के बारे में जानना चाहते हैं।

जो संचार के दृष्टिकोण (Point of View) तथा वर्तमान व्यवहार की पुष्टि करते हैं या जो व्यवहार (Behavior) के अन्य पहलुओं को और ज्यादा स्पष्ट करते हैं।

इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार लोग उन सूचनाओं को नजरअंदाज (Ignore) करते हैं जो असन्तुलन को और ज्यादा बढ़ाते हैं।

अगर कोई व्यक्ति किसी को पसंद नहीं करता तो वह उसके विचारों को भी पसंद नहीं करता है।

क्योंकि वह जो कुछ भी कहे वह सामंजस्यता (Consistency) के कारण संज्ञानात्मक असंतुलन (Imbalance) नहीं कर सकेगा।

असन्तुलन तब और भी ज्यादा तीव्र होगा जब कोई व्यक्ति अपने स्वभाव के विपरीत कुछ कहेगा या फिर उन अपेक्षाओं (Expectations) पर खरा नहीं उतरेगा जो उसकी छवि के अनुरूप नहीं है।

समाजशास्त्रीय सिद्धान्त (Sociological Theory)

मानव सामाजिक प्राणी है और संसार में बिना संचार किए वह जीवित नहीं रह सकता है। इसीलिए मानव को संचार प्राणी कहा जाता है।

मानव के समाजशास्त्रीय अध्ययन करने वाले सिद्धान्तों को समाजशास्त्रीय सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के निम्न भाग हैं।

उत्पादन का सिद्धान्त (Cultivation Theory)

इस सिद्धांत का निर्माण जार्ज गर्वनर (George Gerbner) व उसके सहयोगियों ने किया।

इस सिद्धांत की मूल धारण यह है की मीडिया के श्रोता मीडिया द्वारा प्रसारित प्रमुख संदेशों और छवियों को अनजाने में बहुत तल्लीनता से ग्रहण कर लेते हैं।

जिससे मिडिया के सूक्ष्म व अनदेखे प्रभाव पड़ते हैं।

गर्वनर के अनुसार ज्यादा टेलीविजन देखने वाले लोग इस माध्यम के प्रति एक ऐसा गहरा लगाव (Obsession) विकसित कर लेते हैं

कि उन्हें सूचना व विचारों के दूसरे स्रोत तुच्छ प्रतीत होते हैं।

सामाजिक ज्ञान का सिद्धान्त (Social Learning Theory)

यह सिद्धांत संचार सिद्धांतों में अत्यधिक प्रचलित सिद्धांत है।

गवर्नर इस सिद्धांत के अनुसार जनसंचार माध्यम एक कुशल शिक्षक की भांति श्रोताओं, दर्शकों और पाठकों को दुनिया के बारे में शिक्षित करते हैं।

दूरदर्शन देखने के कारण यह संचार माध्यम लोगों को सकारात्मक व नकारात्मक व्यवहार का ज्ञान देते हैं।

आमतौर से जो लोग व्यक्तिगत जीवन के व्यवहार में इन माध्यमों के संपर्क में नहीं आ पाते।

इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य यह है कि लोग किस तरह बिना अनुभव किए अवलोकन (Observation) से कैसे जानकारी (learning) पाते हैं।

एजेंडा निर्धारण का सिद्धान्त (Agenda Setting Theory)

अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन (Walter Lippman) ने सर्वप्रथम इस सिद्धांत पर विचार किया।

उनके अनुसार लोग वास्तविक घटनाओं को न देखकर मीडिया द्वारा बनाये गये अवास्तविक वातावरण पर प्रतिक्रियाएं जाहिर करते हैं।

क्योंकि मीडिया हमारे मस्तिष्क में तस्वीरों का चित्रण करते हैं।

लिपमैन के शब्दों में हमारा वास्तविक वातावरण इतना विशाल, जटिल और क्षणिक है की हम उसे समूचे रूप से नहीं जान सकते है।

प्ले सिद्धांत (Play Theory)

विलियम स्टीफैन्सन (William Stephenson) के अनुसार जो लोग जनमाध्यम के हानिकारक प्रभाव के बारे में बोलते हैं।

स्टीफैन्सन उन्हें तर्क देता है कि माध्यम सबसे पहले अनुभव दर्शाता है और उनका यह भी मानना है कि लोग समाचार-पत्र भी आनन्द के लिए पढ़ते है न कि सूचना या ज्ञान के लिए।

स्टीफैन्सन के अनुसार माध्यम समाज में तनावग्रस्त हालत को रोकने का कार्य करते हैं क्योंकि ये माध्यम संचारिक आनन्द देते हैं।

स्टीफैन्सन के अनुसार जनसंचार के दो मुख्य उद्देश्य हैं।

एक किस तरह संचारिक आनन्द को दुनिया में बढ़ाया जाये।

दूसरा एक व्यक्ति के लिए सामाजिक नियंत्रण के बावजूद किस व्यक्ति की स्वयात्तता कैसे कायम रखनी है?

प्रयोग एवं संतुष्टि का सिद्धान्त (Uses and Gratification Theory)

अतः यह सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित है कि लोग मीडिया का प्रयोग कैसे करते हैं? बजाए इसके की मीडिया लोगों का प्रयोग कैसे करता है?

इस सिद्धांत में ‘प्रयोग’ (Uses) का अर्थ है कि श्रोता का सक्रिय होना और वह अपनी इच्छा के अनुसार मीडिया का प्रयोग करते हैं।

‘सन्तुष्टि’ (Gratification) उस प्रतिफल की ओर संकेत करती है जो श्रोता माध्यमों का प्रयोग करके प्राप्त करते हैं।

इस प्रकार यह सिद्धांत संदेश की बजाए मीडिया के श्रोताओं पर केन्द्रित है।

काटज् और ब्लूमर के अनुसार “प्रयोग और संतुष्टि का सिद्धांत मीडियों के संदेशों की बजाए मीडिया के श्रोताओं को अपना प्रारम्भिक बिन्दु मानता है।

मीडिया से उनके सीधे अनुभवों के आधार पर उनके व्यवहार का अध्ययन करता है।

व्यक्तिगत प्रभाव सिद्धांत (Personal Effects Theory)

इस सिद्धान्त को 1940 में संयुक्त राज्यों के राष्ट्रपति चनाव के नतीजों के लिए प्रयोग में लाया गया था।

इस सिद्धान्त का संचालन पॉल लेजस्पर्लड (Paul Lazarsfled) एवं गाडल (Gaudel) ने 1948 में किया। इस सिद्धान्त के दो प्रकार हैं।

द्विचरणीय संचार प्रवाह का सिद्धान्त (Two-Step Flow Theory)

पॉल लेजर्स फ्लड और उसके सहयोगी गाडल ने बुलेट सिद्धान्त के स्थान पर द्विचरणीय प्रवाह को स्थापित किया।

इन्होंने इरी कांउटी (Erie County) में वोटरों के व्यवहार का अध्ययन 1940 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान किया।

जो परिणाम सामने आये वो आश्चर्यजनक थे।

उन्होंने पाया कि मास मीडिया द्वारा चलाई गई अभियान (कैम्पेन) का लोगों के वोट देने पर प्रभाव बहुत कम था।

मीडिया ने तो बस लोगों की पूर्व धारणाओं को पुख्ता किया।

लोगों ने अपने ढंग से उम्मीदवारों का चुनाव किया और मीडिया का उपयोग अपने पक्ष में सूचना एकत्रित करने के लिए किया।

इस सिद्धांत के अनुसार लोगों ने समूह में वोट दिए।

अर्थात एक समूह (जैसे कि परिवार, चर्च सामाजिक समूह आदि) से सम्बन्धित सदस्यों ने अपने समूह की राय के अनुसार वोट दिए।

लोग आपसी बातचीत से ज्यादा प्रभावित हुए। मीडिया का प्रभाव कम रहा।

इसके परिणामस्वरूप लेजर्स फ्लड ने द्विचरणीय सिद्धान्त विकसित किया।

जिसके अनुसार : “रेडियो और प्रिंट माध्यमों से सूचना “ओपीनियन लीडर” तक जाती है।

ओपीनियन लीडर द्वारा जनसंख्या के शेष भाग तक पहुंचती हैं।

बहुचरणीय संचार प्रवाह के सिद्धान्त (Multi-step Flow Theory)

द्विचरणीय संचार सिद्धान्त में परिवर्तन लाकर बहुचरणीय सिद्धान्त विकसित किया गया।

इस सिद्धान्त के अनुसार ओपीनियन लीडरों का प्रभाव के नीचे की तरफ अर्थात् जन श्रोताओं को प्रभावित करना ही नहीं होता है।

यह ऊपर की तरफ अर्थात मीडिया को भी प्रभावित कर सकते हैं कि वे किस प्रकार कार्य करें या ये प्रभाव दाएं-बाएं ओर भी हो सकता है।

अर्थात् आपीनियन लीडर आपस में भी विचार सांझा कर सकते हैं।

इस सिद्धान्त का प्रयोग यह जानने के लिए किया गया है कि एक नई तकनीक (Innovation) या नया विचार या वस्तु का एक सामाजिक प्रणाली में कैसे प्रसार होता है।

रोजर्स और शू-मेकर ने स्पष्ट किया है कि जनसंदेश प्रेषक श्रोता से विभिन्न व्यवहार, प्रक्रिया वाला होता है।

स्रोत तभी श्रोता को प्रभावित कर सकता है जब दोनों की चिन्तन प्रक्रिया में कुछ समानता हो।

इसे उन्होंने समानुभूति (Homophily) की संज्ञा दी है। इसके विपरीत असमानुभूति (Heterophily) की प्रक्रिया संदेश के प्रभाव को कम करती है।

अतः व्यवहारिक अथवा तौर तरीकों में परिवर्तन के लिए समानुभूति अनिवार्य है।

काई सिद्धान्त (Stalagmite Theory)

संचार की लम्बी अवधि के प्रभावों पर केन्द्रित इस सिद्धान्त का निर्माण प्रसिद्ध संचार विशेषज्ञ विल्बर श्रम ने किया।

इस सिद्धान्त के अनुसार संचार द्वारा व्यक्तियों में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है और यह एक लम्बी प्रक्रिया है।

यह बिल्कुल वैसे ही होता है जैसे किसी गुफा में तल पर धीरे-धीरे एक स्टैलेग्माइट (काई) का निर्माण होता है।

श्रम के शब्दों में, “एक गुफा की छत से बूंद-बूंद टपकने वाला पानी गुफा के तल पर कैल्शियम के अवशेष (Residue) छोड़ता रहता है।

जो कि लम्बे समय बाद एक ढेर में परिवर्तित हो जाते हैं। जिसे काई का नाम दिया गया है।

हरेक बूंद बहुत छोटा सा अवशेष छोड़ती है और यह पता लगाना मुश्किल है कि एक बूंद अवशेष कौन सा है?

अथवा एक बूंद से उस काई के आकार में कितना परिवर्तन आता है।

लेकिन सारी बूंदें इकठे मिलकर एक स्टैलेग्माइट (काई) बनाती हैं।

कई सालों में इसके आकार में परिवर्तन आता है।

श्रम के अनुसार हमारा व्यक्तित्व जिसमें हमारी आदतें, धारणाएं, रवैया, व्यवहार, मूल्य आदि शामिल हैं।

बिल्कुल वैसे ही निर्मित होता है जैसे कि स्टैलेग्माइट (काई)। बहुत धीरे-धीरे, लम्बे समय तक यह निर्माण प्रक्रिया चलती रहती है।

जैसे कि जब हम संचार की एक बूंद व्यक्ति (प्रापक) मे डालते हैं। जिसमें कि लाखों बूंदें या संदेश पहले ही अपना अवशेष बना चके हैं।

ऐसी स्थिति में यह उम्मीद करना मुश्किल है कि उस एक बूंद द्वारा उसके व्यक्तित्व में कोई बुनियादी परिवर्तन लाया जा सकेगा।

अगर हम किसी बच्चे के साथ संचार करते हैं तो यह आसन है क्योंकि उसकी वैचारिक पर्त बहुत लचीली होती है।

उसका व्यवहार व आदतों में दृढ़ता नहीं होती है। जिसमें परिवर्तन सम्भव होता है।

संकेन्द्रीय वृत्त का सिद्धांत (Concentric Circle Theory)

इस सिद्धान्त के अनुसार किसी धर्म/दर्शन/सिद्धान्त के प्रसार के लिए एक सशक्त केन्द्र का होना बहुत जरूरी है।

क्योंकि इसके बिना उस धर्म/दर्शन/सिद्धांत का प्रसार असंभव है।

अगर केन्द्र बहुत मजबूत व प्रभावशाली है तो संदेश अपने आप संकेन्द्रीय वृत्तों से प्रभावित होता हुआ बाहरी वृत्त तक पहुंचेगा जिसमें साधारण जनता शामिल है।

अब हम मॉडल के विभिन्न भागों पर चर्चा करेंगे।

संकेन्द्रीय वृत्त का सिद्धांत (Concentric Circle Theory in Hindi)
संकेन्द्रीय वृत्त का सिद्धांत (Concentric Circle Theory in Hindi)
  • केन्द्र महान विचारक (Great Thinker)-किसी धर्म, दर्शन या सिद्धांत के पीछे एक सशक्त व्यक्तित्व या केन्द्र होता है।
  • इस केन्द्र का प्रभावशाली होना बहुत जरूरी है।
  • जिसके लिए हम इसके पास विश्वसनीयता, ज्ञान, शक्ति व ज्ञान के प्रसार की क्षमता होना लाजमी है।
  • विचारक (Thinkers)-ये वे लोग होते हैं जो महान विचारक की दिशा में ही सोचते हैं व उसके विचारों को आगे बढ़ाते हैं।
  • शिष्य (Disciples)-ये केन्द्र से भावनात्मक रूप में बहुत गहरे जुड़े होते हैं।
  • ये लोग उनके सच्चे प्रशंसक होते हैं जो उनके विचारों की आँख मूद कर अपनाते हैं।

इन्हें भी देखें –

निष्कर्ष (Conclusion)

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ हर संचार में एक प्रेषक, एक संदेश और एक प्राप्तकर्ता शामिल होता है।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ यह सरल लग सकता है।

लेकिन संचार वास्तव में एक बहुत ही जटिल विषय है।

संदेश को प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक प्रेषित करने से चीजों की एक विशाल श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ इनमें हमारी भावनाएं, सांस्कृतिक स्थिति, संचार के लिए उपयोग किए जाने वाले माध्यम और यहां तक कि हमारे स्थान शामिल हैं।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ संचार हमारे जीवन का आधार है।

अगर संचार करने नहीं आयेगा, तो हम मनुष्यों का जरूरत ही पूरा नहीं हो पायेगा और दूसरो का बात ही नहीं समझ पाएंगे।

‘संचार क्या है? (Sanchar Kya Hai)’ आदिकाल से ही हमारे समाज में संचार होता रहा है। मनुष्य के साथ-साथ जानवरों और पक्षियों में भी संचार होता है।

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Karuna Tiwari is an Indian journalist, author, and entrepreneur. She regularly writes useful content on this blog. If you like her articles then you can share this blog on social media with your friends. If you see something that doesn't look right, contact us!

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