कबीर दास जी का जीवन परिचय (Kabir Das Biography in Hindi)

कबीर दास जी कौन है? (Kabir Das in Hindi)

इस पोस्ट में “कबीर दास जी का जीवन परिचय (Kabir Das Biography in Hindi)” के बारे में जानेगें। कबीर दास हिंदी भाषा के भक्ति काल युग के प्रमुख कवि और समाज सुधारक थे। उनकी मुख्य भाषा सधुक्कड़ी थी। (सधुक्कड़ी भाषा हिंदुस्तान की एक स्थानीय बोली है। जो मध्ययुगीन उत्तर भारत की एक लोकप्रिय भाषा हुआ करती थी।)

लेकिन इनके दोहों और पदों में हिंदी भाषा की सभी मुख्य बोली की झलक दिखलाई पड़ती है। इनकी रचनाओं में ब्रज (Braj), राजस्थानी (Rajasthani), पंजाबी (Punjabi), हरयाणवी (Haryanvi) और हिंदी (Hindi) खड़ी बोली की जयादा इस्तेमाल किया गया है।

कबीर दास जी का जीवन परिचय (Kabir Das Biography in Hindi)
“कबीर दास जी का जीवन परिचय (Kabir Das Biography in Hindi)” संतकवि कबीर दास 15वीं शताब्दी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया।

‘कबीर दास जी का जीवन परिचय’ कबीर दास भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा से प्रभावित थे। कबीर का प्रभाव हिन्दू, इस्लाम और सिख तीनों धर्मों में मिलता हैं। कबीर संतमत के प्रवर्तक और संत काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।

‘कबीर दास जी का जीवन परिचय’ समाज सुधारक संत कबीर दास हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान रखते हैं। इनके समान सशक्त और क्रांतिकारी कोई अन्य कवि हिन्दी साहित्य में दिखलाई नहीं पडता है।

‘Kabir Das Ji ka Jeevan Parichay’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीरदास के काव्य और व्यक्तित्त्व का आकलन करते हुए लिखा है। “कबीर की उक्तियों में कहीं – कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बडी प्रखर थी।”

‘Kabir Das ki Jivani’ इसमें कोई संदेह नहीं है। कबीर की विलक्षण प्रतिभा पर ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’ ने लिखा है। “हिन्दी साहित्य के हजार वर्षो के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्त्व लेकर लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। भाषा पर कबीर का जबर्दस्त पकड़ था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। उनके संत रूप के साथ ही उनका कवि रूप बराबर चलता रहता है।”

कबीर दास का जन्म कब हुआ? (Kabir Das ka Janm Kab Hua)

नामसंत कबीरदास (Kabir Das)
जन्म और जन्म स्थान1398, लहरतारा ताल, काशी, बनारस
मृत्यु1518
माता और पिता का नामस्वर्गीय नीमा जुलाहे, स्वर्गीय नीरू जुलाहे
पुत्र और पुत्री का नामकमाल दास, कमाली दास
पत्नी का नामलोई दास
कार्य क्षेत्रसमाज सुधारक, कवि, सूत काटकर कपड़ा बनाना
मुख्य रचनाएंसाखी, सबद, रमैनी
भाषाअवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी
गुरुगुरु रामानंद जी

“संत कबीर दास बायोग्राफी इन हिंदी” कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ (Legends) प्रचलित हैं। विद्वानों का माना है की कबीर दास के माता- पिता के विषय में एक राय निश्चित नहीं है। कबीर दास “नीमा’ और “नीरु’ की वास्तविक संतान थे? या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था?

कहा जाता है कि नीरु जुलाहे को यह बच्चा काशी के लहरतारा ताल पर पड़ा मिला, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर दास कहलाया।

कबीर दास के जन्म के संबंध में कुछ लोगों का मानना. है की रामानन्द स्वामी एक विधवा स्त्री को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। जिस वजह से वो विधवा स्त्री गर्भवती हो गयी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया।

ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। जबकि कबीर पन्थियों का मानना है की कबीर दास का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ।

कबीरदास के जन्म स्थान के बारे में विद्वानों में मतभेद है परन्तु अधिकतर विद्वान इनका जन्म ‘काशी’ में ही मानते हैं और स्वयं कबीर का यह कथन भी ‘काशी’ में ही पैदा होने का सन्देश देता है।

कबीर दास की शिक्षा इन हिंदी (Kabir Das ki Shiksha in Hindi)

15वीं शताब्दी में एक संत थे। उस संत का नाम गुरु रामानंद था। बहुत सारे लोगो ने कबीर दास जी को गुरु रामानंद जी के पास जा कर शिक्षा लेने को कहते थे। कबीर दास शिक्षा लेने के उद्देश्य से वो गुरु रामानंद जी के पास गए।

लेकिन उस समय जात-पात लोगो पर हावी था। जिस वजह से गुरु रामानंद जी ने कबीर दास को अपना शिष्य बनाने से माना कर दिया। लेकिन कबीर दास बचपन से ही जिद्दी स्वभाव के थे।

उनको जो करना होता है वो कर के ही रहते थे। अब कबीर दास ने ठान लिया की रामानंद को अपना गुरु बनाकर रहेगे। एक दिन की बात है, रामानंद जी हर दिन की भातिं गंगा नदी स्नान के लिए जा रहे थे।

गंगा नदी पर सीढियाँ बनी थी। तभी कबीर दास सीढियों पर जाकर लेट गए और अँधेरे की वजह से रामानंद जी ने कबीर दास के छाती पर पैर रख दिए। तभी उनके मुख से हे राम निकल गया।

साथ ही उन्होंने कबीर दास से माफ़ी भी मांगी। लेकिन कबीर दास ने कहा की माफ़ी तभी मिलेगी जब आप मुझे अपना शिष्य बना लेंगे। तो इस बार रामानंद जी मना नही कर सके और इस तरह कबीर दास जी रामानंद के शिष्य बन चुके थे और इस प्रकार कबीर दास जी शिक्षा दीक्षा का ज्ञान रामानंद जी से मिला।

कबीर दास का वैवाहिक जीवन

“Kabir Das Biography in Hindi” संत कबीरदास का विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ था। विवाह के बाद कबीर और लोई को दो संतानें हुई थी। जिसमें एक लड़का व दूसरी लड़की थी।

कबीर दास के लड़के का नाम कमाल तथा लड़की का नाम कमाली था। कबीर दास की धार्मिक प्रवृति होने के कारण उनके घर साधु-संत और सत्संग करने वालों की हर दिन आते जाते रहते थे।

अत्यधिक गरीबी और ऊपर से निरंतर मेहमानों के आने-जाने के कारण अक्सर कबीर दास की पत्नी उनसे झगड़ा करती थी। इस पर कबीर दास अपनी पत्नी को भी दोहे सुना कर इस तरह समझाते थे। इसका वर्णन इस दोहे में इस प्रकार से हैं।

सुनि अंघली लोई बंपीर।
इन मुड़ियन भजि सरन कबीर।।

कबीर दास के एक और दोहे से इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि उनका पुत्र कमाल कबीर के विचारों का विरोधी था। जो इस प्रकार हैं।

बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल।
हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।।

वहीं कबीर दास को मानने वाली दूसरी धारा का मानना हैं कि कबीर बाल-ब्रह्मचारी और विराणी थे। उनके अनुसार कामात्य उनका शिष्य था तथा कमाली और लोई उनका शिष्या का नाम था। कबीर लोई शब्द का इस्तेमाल कम्बल के रूप में भी करते थे जो इस प्रकार हैं।

कहत कबीर सुनहु रे लोई।
हरि बिन राखन हार न कोई।।

कबीर के एक दूसरे दोहे से इस बात का संकेत मिलता हैं कि कबीर की पत्नी ही बाद में कबीर की शिष्या बन गयी होंगी। जो इस प्रकार हैं।

नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार।
जब जानी तब परिहरि, नारी महा विकार।।

संत कबीर का साहित्य (Kabir Das ka Sahityik Parichay)

कबीर दास जी के नामों से मिले ग्रंथों की संख्या अलग-अलग हैं। एच.एल विल्सन के अनुसार कबीर के नाम से कुल 8 ग्रन्थ हैं। वहीं विशप जी.एच वेस्टकॉट ने कबीर के नाम पर कुल 84 ग्रंथों की सूची जारी की हैं। कबीरदास की वाणी का संग्रह “बीजक” नाम से मशहूर हैं। यह तीन हिस्सों में विभाजित हैं जो इस प्रकार से हैं। रमैनी, सबद और सारवी।

कबीर दास की रचनाएँ इन हिंदी (Kabir Das ki Rachna Hindi Mein)

कबीरदास जी ने अपनी अनूठी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया, साथ ही अपने दोहों से समाज में फैली तमाम तरह की कुरोतियों को भी दूर करने की कोशिश की है।

कबीरदास जी कर्मकांड, पाखंड, मूर्ति पूजा आदि के घोर विरोधी थे। जिन्हें कई अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान था। वे अक्सर ही अपने अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करते थे।

हिन्दी साहित्य के महाज्ञानी कबीर दास जी की वाणी को साखी, सबद और रमैनी तीन अलग-अलग रुपों में लिखा गया है। जो कि “बीजक” नाम से मशहूर है। वहीं कबीर दास ग्रंथावली में उनकी रचनाओं का संग्रह देखने को मिलता है। यह राजस्थानी, पंजाबी, पूरबी, अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली समेत कई अलग-अलग भाषाओं का मिश्रण है।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि कबीर दास जी द्धारा लिखी गईं ज्यादातर किताबें दोहा और गीतों का एक विशाल संग्रह था। जिसकी संख्या 72 है।

कबीर की वाणी का संग्रह “बीजक” के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं-

  • रमैनी
  • सबद
  • साखी
  1. अगाध मंगल
  2. अठपहरा
  3. अनुराग सागर
  4. अमर मूल
  5. अर्जनाम कबीर का
  6. अलिफ़ नामा
  7. अक्षर खंड की रमैनी
  8. अक्षर भेद की रमैनी
  9. आरती कबीर कृत
  10. उग्र गीता
  11. उग्र ज्ञान मूल सिद्धांत- दश भाषा
  12. कबीर और धर्मंदास की गोष्ठी
  13. कबीर की वाणी
  14. कबीर अष्टक
  15. कबीर गोरख की गोष्ठी
  16. कबीर की साखी
  17. कबीर परिचय की साखी
  18. कर्म कांड की रमैनी
  19. काया पंजी
  20. चौका पर की रमैनी
  21. चौतीसा कबीर का
  22. छप्पय कबीर का
  23. जन्म बोध
  24. तीसा जंत्र
  25. नाम महातम की साखी
  26. निर्भय ज्ञान
  27. पिय पहचानवे के अंग
  28. पुकार कबीर कृत
  29. बलख की फैज़
  30. वारामासी
  31. बीजक
  32. व्रन्हा निरूपण
  33. भक्ति के अंग
  34. भाषो षड चौंतीस
  35. मुहम्मद बोध
  36. मगल बोध
  37. रमैनी
  38. राम रक्षा
  39. राम सार
  40. रेखता
  41. विचार माला
  42. विवेक सागर
  43. शब्द अलह टुक
  44. शब्द राग काफी और राग फगुआ
  45. शब्द राग गौरी और राग भैरव
  46. शब्द वंशावली
  47. शब्दावली
  48. संत कबीर की बंदी छोर
  49. सननामा
  50. सत्संग कौ अग
  51. साधो को अंग
  52. सुरति सम्वाद
  53. स्वास गुज्झार
  54. हिंडोरा वा रेखता
  55. हस मुक्तावालो
  56. ज्ञान गुदड़ी
  57. ज्ञान चौतीसी
  58. ज्ञान सरोदय
  59. ज्ञान सागर
  60. ज्ञान सम्बोध
  61. ज्ञान स्तोश्र

कबीर दास के दोहे (Kabir ke Dohe in Hindi)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।

मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो!

रूढ़ीवाद और पाखंडवाद के घोर विरोधी रहे कबीर दास

कबीर दास उनके समय में पाखंड और रूढ़ीवाद अपने चरम पर था। कबीर दास ने इसका खुल कर विरोध किया था। कबीर दास का मानना था की मस्जिद में नमाज पढ़ना, माला जपना, मूर्ति पूजा और तिलक तथा उपवास रखना एक प्रकार का पाखंड हैं। साहित्य में इस प्रकार के पाखंड का खुलकर विरोध किया है।

कबीर दास की मृत्यु कैसे हुई? (Kabir Das ki Mrityu in Hindi)

विभिन्न दस्तावेजो के आधार पर इनकी पूरी आयु 120 साल मानी जाती है और अपने अंतिम समय में कबीर दास जी मगहर चले गये थे। उस समय, लोग मगहर को अशुभ का सूचक (Ominous) के स्थान के तौर पर मानते थे।

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के संत कबीर नगर जिले में मगहर एक क़स्बा और नगर पंचायत है। लोगो का कहना था की मगहर में जो लोग मरते है उनको कभी मुक्ति नहीं मिलती थी।

जो व्यक्ति अपने पुरे जीवन में आडम्बरो के खिलाफ संदेश दिए, और जीवन के सच्चे सिद्धांतो का रास्ता दिखाये। वह व्यक्ति कबीर दास अपने जीवन के अंतिम समय में मगहर जाकर बस गये थे।

बहुत से लोगो ने उन्हें वहा न जाने के लिए समझाया भी था।लेकिन कबीर जी नही माने थे। उनका कहना था की

“क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा।
जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा”

अर्थात जिसके ह्रदय में राम विराजमान हो,उसके लिए काशी और मगहर में कोई भेद नही है। यदि मेरे ह्रदय में राम होने के बावजूद मैंने काशी में प्राण त्यागे तो फिर राम का क्या अहसान होगा मुझपर, क्योंकि काशी में मरने वालों को तो वैसे ही स्वर्ग मिलता है और मगहर वालों को नरक, इसलिए मैं मगहर में ही प्राण त्याग कर इस दुनियाँ को नया संदेश दे सकता हूँ।

इस प्रकार 120 वर्ष की आयु में कबीरदास जी ने सन 1518 में अंतिम साँस लिए और अपना शरीर त्याग किया। कबीर दास को मानने वाले हिंन्दु – मुसलमान दोनों धर्मो के लोग थे।

इस लिए दोनों धर्म अपने अपने परम्परा के अनुसार उनका क्रियाकर्म करना चाहते थे। जिसको लेकर इनके मरने के पश्चात विवाद हो गया। उनक्जे पार्थिव शरीर को एक दफनाना चाहता था तो दूसरा दाहसंस्कार करना चाहता था।

लेकिन ऐसा कहा जाता है की उनके शारीर को जहां ढक कर रखा गया था वहा पर फुल मिले थे। जिसे दोनों धर्मो ने आपस में बाँटकर अपने हिसाब से दाह संस्कार किया।

इस प्रकार कबीर दास जी इस दुनिया से जाते जाते भी एकता का संदेश देते चले गये। उनकी कही गयी बाते आज भी उतनी ही प्रांसगिक है जितना की उस ज़माने में थी यानी कबीर दास जी के बताये गये रास्ते पर हम सभी चले तो निश्चित ही मानव का कल्याण हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FaQs

प्रश्न – काबीर दास कौन है?

उत्तर- संतकवि कबीर दास 15वीं शताब्दी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे।

प्रश्न – कबीर का पूरा नाम क्या है?

उत्तर – संतकवि कबीर दास है।

प्रश्न – कबीर दास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर – 1398, लहरतारा ताल, काशी, बनारस में हुआ था।

प्रश्न – कबीर दास की पत्नी का नाम क्या था?

उत्तर – कबीर दास की पत्नी का नाम लोई दास था।

प्रश्न – कबीर दास के प्रसिद्ध रचनायें कौन-कौन सी है?

उत्तर – रमैनी, सबद, साखी प्रसिद्ध रचनाएँ है।

प्रश्न – कबीर दास जी की भाषा शैली क्या थी?

उत्तर – अवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी भाषा बोलते थे।

प्रश्न – कबीर दास के गुरु कौन थे?

उत्तर – गुरु रामानंद जी थे।

प्रश्न – कबीर दास की मृत्यु कब हुई?

उत्तर – मगहर में 1518 ई० में हुआ था।


इन्हे भी पढ़े –


निष्कर्ष (Conclusion)

संतकवि कबीर दास 15वीं शताब्दी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया।

उनके लेखन सिक्खों के आदि ग्रंथ में भी मिलता है। कबीर दास भारत के महान कवि और समाज सुधारक थे। वे हिन्दी साहित्य के विद्दान थे। कबीर दास के नाम का अर्थ ‘महानता’ से है अर्थात वे भारत के महानतम कवियों में से एक थे।

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Karuna Tiwari is an Indian journalist, author, and entrepreneur. She regularly writes useful content on this blog. If you like her articles then you can share this blog on social media with your friends. If you see something that doesn't look right, contact us!

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